मैं नारी हूं
मैं देवी हूं, मैं नारी हूं,
ममता की बागीचा और फुलवारी हूं।
पति के लिए पतिव्रता और अपने बच्चों की रक्षक हूं,
इसपे जो कोई अगर करें प्रहार,
उसके जीवन का भक्षक हूं।
मैं ही द्रौपदी और मैं ही हूं सीता,
मेरे से ही प्रचलित है महाभारत, रामायण और गीता।
हर युग में इल्जाम मुझपे ही आती है,
पर मैं डरती नहीं,डटकर करती मुकाबला, नहीं हूं कभी घबराती।
मेरे रूप अनेक सीता,काली, चंडी, दुर्गा और सरस्वती,
वक्त के अनुसार मैं रूप बदलकर आती।
पुरूषों की दुनिया ने मुझे कैसी नियति दिखलाई,
कभी जुए में हार गये तो कभी अग्नि परीक्षा दिलवाई,
इन विपत्तियों से संघर्ष कर तप तप कर सोने की तरह चमक कर
अपनी शुद्धता और पवित्रता की जीत हूं पाई।
— मृदुल शरण
