ग़ज़ल
उलझा उलझा रहता है मन न जाने किन जज्बातों में
पर खुद को संभाले रखा है बिगड़े बिगड़े हालातो में।
हम रोज मिटाते लिखते हैं किस्मत के पन्नों पर अक्सर
कोशिश सारी नाकाम रही तकदीर है रब के हाथों में।
हर दर्द छुपा कर रखा था दिल की एक तिजोरी में
तुमने पूछा तो कह डाला सब कुछ बातों ही बातों में।
यह इश्क है ऐसा पागलपन महफिल में सोए रहते हैं
लेकिन जब दुनिया सोती है और हम जगते हैं रातों में।
हमने दुआ जब भी मांगी बस खैर तुम्हारी ही मांगी
रहे फूल कली तेरे दामन में कर लेंगे बसर हम कांटों में।
पीपल की तरह पूजा है तुम्हें रब से मांगा है दुआओं में
“जानिब ” अपनी चाहत का असर कभी देखो तो हमारी आंखों में।
— पावनी जानिब
