लोरी
मां की मीठी लोरी आज भी, कानों में है गूंज रही,
चांद-खिलौना दूंगी तुझे मैं, आज भी नहीं मैं भूल रही।
परियों के देश में ले चल निंदिया, मेरी बिटिया रानी को,
ख्वाब न टूटने देना इसके, बिटिया मेरी सयानी हो।
घूंट-घूंट कर दूध पिलाना, थपकी देकर मुझे सुलाना,
थोड़ी हिलचुल करूं अगर मैं, फिर से लोरी गाना-सुनाना।
बरसा देना मधुर चाँदनी, लोरी में चंदा से कहना,
जुग-जुग जीवे तेरी चाँदनी, निंदिया बिटिया का गहना!
लोरी गाकर मुझे सुलाती, निंदिया रानी को पास बुलाती,
भौरों को गुनगुन करने न देती, मां की लोरी मुझको भाती।
आज नहीं है मां पर लोरी ही, ढल रही गीत-कविताओं में,
इतना प्रवाह था उस लोरी में, जितना होता सरिताओं में!
— लीला तिवानी
