उपन्यास अंश

लघु उपन्यास: रघुवंशी भरत (कड़ी 25)

भरत जी ने फिर कहा- ”भैया! आप अयोध्या लौटकर मेरी माता के कलंक को धो डालिये और पिताजी को भी अपयश से बचाइए।“ यह कहकर उन्होंने एक बार फिर श्री राम के समक्ष दीनता से हाथ जोड़ दिये। श्री राम ने भरत जी के हाथों को अपने हाथों में लिया, किन्तु उनके वचनों का उन पर कोई प्रभाव नहीं पड़ा। उन्होंने मना करने की मुद्रा में सिर हिलाकार पुनः वन में ही रहने का अपना दृढ़ निश्चय दोहराया। श्री राम की यह दृढ़ता देखकर समस्त अयोध्यावासी दुःखी हुए। भरत जी बार-बार श्री राम से अयोध्या लौट चलने की प्रार्थना कर रहे थे और हर बार श्री राम उसे दृढ़ता से ठुकरा रहे थे।

जब भरत जी बार-बार श्री राम से अयोध्या लौट चलने की प्रार्थना करने लगे, तो श्री राम ने उन्हें समझाते हुए कहा- “भाई! जब पिताजी का तुम्हारी माता के साथ विवाह हुआ था, तब तुम्हारे नाना जी ने यह शर्त रखी थी कि कैकेयी के गर्भ से उत्पन्न पुत्र ही अयोध्या का राजा होगा। पिताजी ने यह शर्त स्वीकार कर ली थी। फिर तुम्हारी यशस्वी माता ने देवासुर संग्राम में महाराज की बहुत सेवा की थी, इससे प्रसन्न होकर उन्हें दो वरदान देने का वचन दिया था।

उन्हीं वरदानों के अनुसार तुम्हें अयोध्या का राज्य और मुझे चौदह वर्ष का वनवास दिया गया है। इसलिए तुम अयोध्या लौटकर राज्य को सँभालो और पिताजी को नर्क में गिरने से बचाओ। सच्चा पुत्र वही है, जो पितरों को नर्क से बचाता है। इसलिए तुम शत्रुघ्न और सभी ब्राह्मणों को साथ लेकर अयोध्या लौट जाओ और मैं भी लक्ष्मण और सीता के साथ दण्डकारण्य में प्रवेश करूंगा। हम चारों भाई पिताजी के वचनों की रक्षा करेंगे। इसमें तुम कोई दुःख मत मानो।”

जब श्री राम भरत को इस प्रकार समझाकर अयोध्या जाने का आदेश दे रहे थे, तो नास्तिक मत को माननेवाले ऋषि जाबालि ने कहा- “राजकुमार राम! मनुष्य अकेला ही जन्म लेता है और अकेला ही नष्ट हो जाता है। यहाँ कोई किसी का नहीं है। माता-पिता आदि सभी नाते क्षणिक और अस्थायी हैं, जैसे कोई यात्रा करते हुए किसी सराय में कुछ समय ठहर जाता है।

पिता किसी जीव के जन्म में निमित्त मात्र होता है। उनका वीर्य जब माता के रज से संयोग करता है, तब जीव का जन्म होता है। यह सभी प्राणियों के लिए एक स्वाभाविक स्थिति है। राजा तो चले गये, अब तुम भी अयोध्या लौटकर राज्य सँभालो। वन में व्यर्थ कष्ट उठाना बुद्धिमानी नहीं है।

राजा को जहाँ जाना था वहाँ चले गये, हर प्राणी मरने के बाद इसी प्रकार चला जाता है। अब उनके पीछे आप व्यर्थ में कष्ट मत उठाइए। मुझे उन लोगों के लिए दुःख होता है, तो तथाकथित धर्म के कारण अपनी धन-सम्पत्ति का त्याग करके कष्ट उठाते हैं। वे यहाँ धर्म के नाम पर दुःख भोगकर ही मृत्यु को प्राप्त होते हैं। इसलिए परलोक की चिन्ता छोड़कर यहाँ जो प्रत्यक्ष राज्यलाभ हो रहा है, उसी का सहारा लीजिए। बुद्धिमानी की बात यह है कि आप भरत जी के अनुरोध को स्वीकार करके अयोध्या का राज्य ग्रहण करें।”

ऋषि जाबालि का यह वचन सुनकर श्री राम ने उनको उत्तर दिया- “विप्रवर! आपने जो कहा है वह कर्तव्य-सा दिखाई देता है, पर वास्तव में करने योग्य नहीं है। वह पथ्य-सा दीखने पर भी वास्तव में अपथ्य है। आपका उपदेश धर्म का चोला ओढ़े हुए वास्तव में अधर्म है। आपकी बात मानने पर तो सारा संसार मुझे दुराचारी और कलंकित कहेगा।

यदि मैं आपके बताये मार्ग पर चलूँ, तो मैं स्वेच्छाचारी हो जाऊँगा, फिर सारी प्रजा भी स्वेच्छाचारी हो जाएगी, क्योंकि प्रजा भी राजा का अनुकरण करती है। सत्य का पालन करना ही राजाओं का सबसे बड़ा धर्म होता है। दान, यज्ञ, होम, तपस्या और वेद – इन सबका आधार सत्य ही है। मैं सत्य की शपथ खाकर पिता के आदेश का पालन करना स्वीकार कर चुका हूँ। मैं उनकी मर्यादा को भंग नहीं करूँगा।” इस प्रकार स्पष्ट शब्दों में श्री राम ने ऋषि जाबालि की सलाह को ठुकरा दिया। वे थोड़े रुष्ट भी लग रहे थे।

— डॉ. विजय कुमार सिंघल
भाद्रपद शु. 6, सं. 2082 वि. (29 अगस्त, 2025)

डॉ. विजय कुमार सिंघल

नाम - डाॅ विजय कुमार सिंघल ‘अंजान’ जन्म तिथि - 27 अक्तूबर, 1959 जन्म स्थान - गाँव - दघेंटा, विकास खंड - बल्देव, जिला - मथुरा (उ.प्र.) पिता - स्व. श्री छेदा लाल अग्रवाल माता - स्व. श्रीमती शीला देवी पितामह - स्व. श्री चिन्तामणि जी सिंघल ज्येष्ठ पितामह - स्व. स्वामी शंकरानन्द सरस्वती जी महाराज शिक्षा - एम.स्टेट., एम.फिल. (कम्प्यूटर विज्ञान), सीएआईआईबी पुरस्कार - जापान के एक सरकारी संस्थान द्वारा कम्प्यूटरीकरण विषय पर आयोजित विश्व-स्तरीय निबंध प्रतियोगिता में विजयी होने पर पुरस्कार ग्रहण करने हेतु जापान यात्रा, जहाँ गोल्ड कप द्वारा सम्मानित। इसके अतिरिक्त अनेक निबंध प्रतियोगिताओं में पुरस्कृत। आजीविका - इलाहाबाद बैंक, डीआरएस, मंडलीय कार्यालय, लखनऊ में मुख्य प्रबंधक (सूचना प्रौद्योगिकी) के पद से अवकाशप्राप्त। लेखन - कम्प्यूटर से सम्बंधित विषयों पर 80 पुस्तकें लिखित, जिनमें से 75 प्रकाशित। अन्य प्रकाशित पुस्तकें- वैदिक गीता, सरस भजन संग्रह, स्वास्थ्य रहस्य। अनेक लेख, कविताएँ, कहानियाँ, व्यंग्य, कार्टून आदि यत्र-तत्र प्रकाशित। महाभारत पर आधारित लघु उपन्यास ‘शान्तिदूत’ वेबसाइट पर प्रकाशित। आत्मकथा - प्रथम भाग (मुर्गे की तीसरी टाँग), द्वितीय भाग (दो नम्बर का आदमी) एवं तृतीय भाग (एक नजर पीछे की ओर) प्रकाशित। आत्मकथा का चतुर्थ भाग (महाशून्य की ओर) प्रकाशनाधीन। प्रकाशन- वेब पत्रिका ‘जय विजय’ मासिक का नियमित सम्पादन एवं प्रकाशन, वेबसाइट- www.jayvijay.co, ई-मेल: jayvijaymail@gmail.com, प्राकृतिक चिकित्सक एवं योगाचार्य सम्पर्क सूत्र - 15, सरयू विहार फेज 2, निकट बसन्त विहार, कमला नगर, आगरा-282005 (उप्र), मो. 9919997596, ई-मेल- vijayks@rediffmail.com, vijaysinghal27@gmail.com