गीतिका/ग़ज़ल

गीतिका

विकसित देशों का पैमाना, बस अर्थ को माना है,
विकसित भारत का पैमाना, मानवता को ठाना है।
अध्यात्म की गहराई तक, कौन राष्ट्र पहुँच पाया,
ज्ञान विज्ञान इतिहास पुराना, ब्रह्मांड को जाना है।
ज़ीरो का किया निरूपण, हमने कालखंड को नापा,
पत्थरों की पहचान करी, सागर को भी पहचाना है।
वेद ऋचाओं से ऋषियों ने, त्रिशंकु को स्वर्ग दिखाया,
पंच महाभूत मिला हमने, प्रकृति में भगवान जाना है।
अपने अनुसंधानों से, तुलसी पीपल की पहचान करी,
प्रकृति के हर रज कण को, हमने ईश्वर सा माना है।
यह भारत है हम भारतवासी, सनातन के अनुयायी हैं,
सृष्टि के सृजन में हमने, मानवता हित प्रथम माना है।
हम सदा सदा से विकसित हैं, अध्यात्म अपना आधार,
अध्यात्म नहीं जिस राष्ट्र मे, वहाँ निराधार सब जाना है।
विश्व बन्धुत्व की बात करें हम, सर्वे सन्तु निरामया भाव,
कर्म करें निःस्वार्थ भाव से, कुरुक्षेत्र संदेश अपनाना है।
उदारमना अपनी नीतियाँ, बुराइयों से लड़ना सिखलाती,
सब धर्मों को आदर देना, सनातन का ज्ञान पुराना है।
हैं भरत समान वीर यहाँ, जो शेरों के दाँत गिना करते,
रणक्षेत्र में शिवा व लक्ष्मी, दुश्मन ने शौर्य पहचाना है।
सप्तलोक के गूढ़ रहस्य, ऋषि मुनि खोजते आये यहाँ,
नारद जैसे मुनियों का, लोकों मे पैदल आना जाना है।
कितनी उपलब्धि गिनवायें, किस किस की बात बतायें,
निज स्वार्थ में अपनों ने ही, संस्कृति पर आघात ठाना है।

— डॉ. अ कीर्तिवर्द्धन