हास्य व्यंग्य

व्यंग्य – तुरुप का पत्ता

ताश के खेल में भला ‘तुरुप’ या ‘तुरुप के पत्ते’ को कौन नहीं जानता! इसमें एक छोटे से छोटे पत्ते को जब तुरुप का दर्जा दे दिया जाता है तो उसका भाव इतना अधिक बढ़ जाता है कि वह किसी भी बड़े से बड़े पत्ते पर हावी होना चाहता है।यह किसी को भी पराजित करने अथवा पछाड़ने का एक तरीका होता है। वह उसे पछाड़ता और पराजित करता भी है।अपने आलंकारिक रूप में इसे ‘ट्रम्प कार्ड’ भी कहते हैं। मैं दुनिया के किसी ट्रम्प से परिचित नहीं हूँ, यद्यपि अखबारों और समाचारों में उस ट्रम्प का नाम बहुतायत से लिया और प्रचारित किया जा रहा है। कहा जाता है इन ट्रम्प महोदय में और ताश की गड्डी के ट्रम्प कार्ड (तुरुप के पत्ते ) में कोई अंतर नहीं है। यदि कोई अंतर है भी तो मात्र इतना ही कि ताश की गड्डी में उसे खिलाड़ी चुनते हैं अथवा मान्यता देते हैं ,लेकिन इन ट्रम्प महोदय को भले ही अमेरिका की जनता ने चुना हो ,किन्तु वह तो ‘मान न मान मैं सबका मेहमान ‘ की तर्ज पर बिना बुलाये अपनी चौकी छोड़कर दूसरों के चौके में घुसे आना चाहते हैं। और अपने ट्रम्पत्व के ग्रहण से सबको ग्रस्त कर लेना चाहते हैं।

यह ट्रम्पत्व या तुरुपत्व कोई नई बात नहीं है। यह तो अनादि काल से उस समय से चला रहा है जब कमजोर की लुगाई सबकी भौजाई हुआ करती थी। यह परंपरा उस समय से चालू है जब हर बड़ी मछली अपने से छोटी मछली को खाना चाहती थी और खा भी जाती थी। इस समाज की बड़ी-बड़ी मछलियाँ सदैव से छोटी मछलियों को अपना आहार बनाती चली आ रही हैं। अब वह चाहे नेता हो या अधिकारी,मजदूर हो या व्यापारी,नर हो अथवा नारी,बस हो या बैलगाड़ी -ये ट्रम्प कार्ड और तुरुप के पत्ते सब जगह सफलता पूर्वक चले हैं। जाति के स्तर पर सवर्णों ने अपने से छोटी माने जानी वाली जातियों पर अपना तुरुप का सिक्का जमाया है। यह एक कटु सत्य है।वे अपने ट्रम्प कार्ड के चलते किसी का विकास नहीं देख सकतीं। वे उन पर हावी रहकर उनका शोषण करती आ रही हैं और अपना तुरुप का पत्ता चलाने में सफल भी हैं। किन्तु धीरे -धीरे जागरूकता और शिक्षा के बढ़ते हुए प्रभाव के कारण तथाकथित तुरुप के पत्ते फाड़ कर फेंक दिए जा रहे हैं। कोई बड़ा नेता किसी नए नेता को आगे नहीं बढ़ने देना चाहता ।हाँ,दूसरे दलों की आलोचना करते हुए परिवारवाद में तल्लीन है। अपने बेटे को तो विधायक सांसद या मंत्री बनाना चाहता है,किंतु किसी पड़ौसी को उस रूप में देख पाना उसे फूटी आँख भी नहीं सुहाता।यह भी आधुनिक तुरुपवाद या ट्रम्पवाद है।

हर सास और ननद अपनी नवागता पुत्रवधू या भाभी पर तुरुपचाल चलने से बाज नहीं आतीं। अपनी तुरुप का सिक्का चलाने के लिए वे अपने सासत्व या नंदत्व का झंडा बुलंद किए रहती हैं।यह घर -घर की कहानी है ।घर-घर के स्टील के चूल्हों में एक ही एल.पी. जी. की आग जल रही है। करोड़ों घरों में यदि कोई अपवाद मिल जाए तो वह घर या परिवार सम्मान का पात्र होगा। वह घर देव घर होगा,मानव घर नहीं। जहाँ तुरुप का सिक्का न चले ,वह घर क्या ?वह सास क्या ?वह ननद (जो भाभी को आनन्दित न रहने दे : वही न नद)भी क्या ;जो भाभी को चैन से जीने दे ! ऐसी ननद को ननद की परिभाषा से बाहर करना होगा।

अपने आप अपने बाप की बहन अर्थात बड़ी बुआ बनना कोई अच्छी बात नहीं है ।ये बड़ी बुआएँ देश दुनिया या समाज में रायता फैलाती रही हैं। उन्हें केवल अपनी तुरुप चाल जो चलनी है।इस परंपरा में तिल मात्र भी कमी नहीं आई है। और अब तो देश के देश अपनी तुरुप चाल के लिए बड़ी बुआ बन रहे हैं।जो प्रवृति कभी मानवीय और सामाजिक स्तर पर थी ,अब वह अंतर राष्ट्रीय हो गई है।

आइए इन बड़ी बुआओं को जानें और अच्छी तरह पहचानें। देश और हम सभी जाग गए हैं।इसलिए ये ट्रम्प कार्ड दूर भाग गए हैं। अब मित्र !मित्र!! का इत्र सर्वत्र अपने चरित्र का स्वरित्र बजा रहा है।जिसकी मधुरता में भरा संगीत हम सब पहचान भी रहे हैं। हम वह हिरन नहीं हैं,जिसे सारंगी बजाकर सम्मोहित किया जा सके।बहुत चल गईं तुरुप की चालें और ट्रम्प की तालें, हम इतने सीधे भी नहीं कि सीधे समझकर अपनी ग्रीवा ही कटा लें।यदि अपने अंदर कूव्वत है तो किसी ट्रम्प के ताश को ही क्यों अपनायेंगे ?दुनिया बहुत बड़ी है, यदि सामर्थ्य होगी तो दूसरे भी दौड़े चले आयेंगे।

— डॉ. भगवत स्वरूप ‘शुभम’

*डॉ. भगवत स्वरूप 'शुभम'

पिता: श्री मोहर सिंह माँ: श्रीमती द्रोपदी देवी जन्मतिथि: 14 जुलाई 1952 कर्तित्व: श्रीलोकचरित मानस (व्यंग्य काव्य), बोलते आंसू (खंड काव्य), स्वाभायिनी (गजल संग्रह), नागार्जुन के उपन्यासों में आंचलिक तत्व (शोध संग्रह), ताजमहल (खंड काव्य), गजल (मनोवैज्ञानिक उपन्यास), सारी तो सारी गई (हास्य व्यंग्य काव्य), रसराज (गजल संग्रह), फिर बहे आंसू (खंड काव्य), तपस्वी बुद्ध (महाकाव्य) सम्मान/पुरुस्कार व अलंकरण: 'कादम्बिनी' में आयोजित समस्या-पूर्ति प्रतियोगिता में प्रथम पुरुस्कार (1999), सहस्राब्दी विश्व हिंदी सम्मलेन, नयी दिल्ली में 'राष्ट्रीय हिंदी सेवी सहस्राब्दी साम्मन' से अलंकृत (14 - 23 सितंबर 2000) , जैमिनी अकादमी पानीपत (हरियाणा) द्वारा पद्मश्री 'डॉ लक्ष्मीनारायण दुबे स्मृति साम्मन' से विभूषित (04 सितम्बर 2001) , यूनाइटेड राइटर्स एसोसिएशन, चेन्नई द्वारा ' यू. डब्ल्यू ए लाइफटाइम अचीवमेंट अवार्ड' से सम्मानित (2003) जीवनी- प्रकाशन: कवि, लेखक तथा शिक्षाविद के रूप में देश-विदेश की डायरेक्ट्रीज में जीवनी प्रकाशित : - 1.2.Asia Pacific –Who’s Who (3,4), 3.4. Asian /American Who’s Who(Vol.2,3), 5.Biography Today (Vol.2), 6. Eminent Personalities of India, 7. Contemporary Who’s Who: 2002/2003. Published by The American Biographical Research Institute 5126, Bur Oak Circle, Raleigh North Carolina, U.S.A., 8. Reference India (Vol.1) , 9. Indo Asian Who’s Who(Vol.2), 10. Reference Asia (Vol.1), 11. Biography International (Vol.6). फैलोशिप: 1. Fellow of United Writers Association of India, Chennai ( FUWAI) 2. Fellow of International Biographical Research Foundation, Nagpur (FIBR) सम्प्रति: प्राचार्य (से. नि.), राजकीय महिला स्नातकोत्तर महाविद्यालय, सिरसागंज (फ़िरोज़ाबाद). कवि, कथाकार, लेखक व विचारक मोबाइल: 9568481040