ग़ज़ल
जो बोया गया बीज वही फल गया।
जो आया था तूफ़ान वह टल गया।।
नाव तैरायी तो थी बड़े शौक से।
था रहा एक काग़ज़ तभी गल गया।।
अभियंता देता न कभी आश्वासन।
बाँधा था बाँध लेकिन बह जल गया।।
कदम जो बढ़ाया पीछे हटा लिया।
दिल के सारे ही अरमान दल गया।।
सह सका न जो औरों की ही उन्नति।
सूरज की मानिंद वह तो ढल गया।।
चलता ही साथ था हर पल हर कदम।
भरे थे किसने किसने कान वह बदल गया।।
कच्चे कभी न हो कान के ही तुम्हीं
सच्चाई सुन वही हो बेकल गया।।
धोखा देने वाले यह जानते नहीं।
कोई तभी उसको भी तो छल गया।।
कर ले भरोसा जो अब प्यार में ही।
बात में किसी का क्यों हो दखल गया।।
फ़ैसला लेने की कुव्वत ही नहीं।
किसी कर्म में डाला क्यों खलल गया।।
बदनामी करने में बदनाम हुये।
सत्य का इरादा बन ही अटल गया।।
— रवि रश्मि ‘अनुभूति’
