गोवर्धन पूजा
गोवर्धन पर्वत,
हरित मुकुट-सा नभ में,
भक्ति की छाया।
कृष्ण की मुस्कान,
धरती का आशीर्वाद,
मन में आलोक।
गायों की रुनझुन,
घंटों की मधुर तान,
साँसों में श्रद्धा।
अन्नकूट सजे,
सात्विकता का उत्सव,
प्रेम का प्रसाद।
दीपों की माला,
जलते अरमानों में,
कृष्ण का घरौंदा।
गोपाल की बांसुरी,
मन को हर ले जाए,
मधुर स्मृति-धुन।
व्रज की गलियों में,
सुगंधित तुलसी महके,
भोर का अर्पण।
बूँदों की झंकार,
गोवर्धन गिरिराज,
सजीव प्रतीक।
भक्त हृदय झुके,
करुणा के सागर में,
शांति की लहरें।
कृष्ण की कृपा से,
धरती हरितमयी हो,
अन्नपूर्णा दे।
भक्ति के आँगन में,
हर दिल दीप बने,
सच्चा उत्सव यह।
गोवर्धन पूजा,
प्रेम, प्रकृति, प्रभु का,
एक संगम है।
— डॉ. अशोक, पटना
