इजाज़त दे दी है मैंने
रात की चादर,
चाँद की चुप हलचल में,
तेरा नाम आया।
हवा ने कहा,
तेरी खुशबू संग लायी,
बीते पल जागे।
पेड़ की शाखों पर,
गिरती हुई धूप हँसी,
तेरा चेहरा था।
सन्नाटा बोला,
तेरे कदमों की गूंज,
अब भी बाकी है।
खिड़की की सिल पर,
धूप ने जो रेखा खींची,
वो तुझसे मिलती।
बरसात आई,
भीगे सपनों की धरती,
तेरा असर है।
हर साँस में अब,
थोड़ी सी तेरी आहट,
थोड़ा सा सुकून।
समय ठहरकर,
देख रहा है मुझको,
तेरे जाने के बाद।
मैंने भी आज,
दिल की चौखट पर धीरे,
इजाज़त दे दी।
अब जो भी आए,
तेरी यादों के रस्ते,
खुशबू बन जाए।
तू मुस्कुरा दे,
तो हर मौसम महके,
हर जख्म हँसे।
तेरे जाने से,
मैं अधूरा नहीं अब,
मैं पूरा तू हूँ।
— डॉ. अशोक
