ग़ज़ल
वो कमसिन दौर सेही बदचलन है।
नहीं इस रोग का कोई शमन है।
जगाते शाह को भी चोर को भी,
सियासत का पुराना ये चलन है।
सफ़ाई पर नहीं दो यार लेक्चर,
अगर गन्दा मकां का ही सहन है।
मेरे महबूब का जलवा न पूछो,
बड़ी ही खूबसूरत गुल बदन है।
बहुत है ख़ूबसूरत मुल्क अपना,
हिमालय है यहाँ गंगो जमन है।
— हमीद कानपुरी
