कविता

१४ नवम्बर बाल दिवस

छोड़ के सारी तिकड़मबाजी
सीधा व सरल मार्ग अपनाएं
वह बचपन के दिन बहुत प्यारे थे
दिल करे फिर से बच्चा बन जाएं।

न कोई चालाकी, न चालबाजी
सिर्फ स्पष्टता और बेबाकवाजी
मन के अंदर तक घर कर जाए
दिल करे फिर से बच्चा बन जाएं।

बहुत देर तक मन में बैर न रखते
कुछ ही पलों में फिर साथ करते
कड़वाहट वे सब जल्द भूल जाएं
दिल करे फिर से बच्चा बन जाएं।

जाति, धर्म का कोई भेद न पालते
माता पिता को ही भगवान जानते
ऐसी मासूमियत सबके मन भाए
दिल करे फिर से बच्चा बन जाएं।

जैसे -जैसे इंसान परिपक्व होता
और जिम्मेदारियों का बोझ ढोता
लालच तथा बैर भाव बढ़ता जाए
दिल करे फिर से बच्चा बन जाएं।

कितने ही बड़े क्यों न हो जाओ
वह सुनहरे दिन न भूल पाओ
जब रह- रहकर वो दिन याद आएं
दिल करे फिर से बच्चा बन जाएं।

बीता समय कभी वापस न आता
बाद में तो केवल मन पछताता
हर एक क्षण का आनंद उठाएं
दिल करे फिर से बच्चा बन जाएं।

सबके ह्रदय में एक बच्चा पलता
समय-बेसमय अठखेलियां करता
यही सोच-सोचकर मन मुस्कुराए
दिल करे फिर से बच्चा बन जाएं।

लो १४ नवम्बर बाल दिवस आया
नव उत्साह और उमंग साथ लाया
बच्चों को ह्रदय से शुभकामनाएं
दिल करे फिर से बच्चा बन जाएं।

आप सभी को बाल दिवस की
अनंतानंत शुभकामनाएं
‌ दिल करे फिर से
बच्चा बन जाएं।।

— नवल अग्रवाल

*नवल किशोर अग्रवाल

इलाहाबाद बैंक से अवकाश प्राप्त पलावा, मुम्बई