सामाजिक

सर्दियों की वो ठंडी सुबहें और शामें

सर्दियों की वो ठंडी सुबहें और शामें याद आती हैं जब धुंध की पतली चादर गाँव की गलियों पर उतर आती थी और हर साँस से भाप निकलती थी, जैसे मौसम भी धीरे से कुछ कहना चाहता हो। उस जमाने में ठंड सिर्फ़ जिस्म को नहीं छूती थी, दिलों के रिश्तों को भी और करीब ले आती थी। घरों के आँगन में या चौपाल के किनारे लकड़ियों का अलाव सजाया जाता, सूखी टहनियों की ख़ुशबू और धुएँ की हल्की सी चुभन हवा में घुल जाती, पर उसका एहसास दिल को सुकून देता। बच्चे दूर से ही दौड़ते हुए आते, हाथ रगड़ते, फूँक मारकर हथेलियों को गरम करते, बुज़ुर्ग अपनी ऊनी टोपी सँभालते, कंधों पर शाल डाले अलाव के घेर में बैठ जाते और जवान इधर-उधर से लकड़ियाँ जोड़कर आग को और भड़काते। चिंगारियाँ कभी-कभी ऊपर को उड़तीं तो लगता जैसे आसमान पर छोटे-छोटे तारे अचानक ज़िंदा होकर पास चले आए हों। चेहरे आधे धुएँ और आधे उजाले में नज़र आते, मगर आँखों में जो चमक थी, वो हर कमी पर भारी पड़ जाती। कोई चाय के लिए आवाज़ देता, किसी के हाथ में पीतल का गिलास होता जिसमें गरम दूध या काढ़ा भाप छोड़ता खड़ा रहता, कोई अपने पुराने ऊनी मोजे दिखाकर हँसी-मज़ाक करता, और उसी हँसी में ठंड की तेज़ी कहीं पीछे छूट जाती। बुज़ुर्ग किस्सों का ख़ज़ाना खोल देते, कभी अपने बचपन की बातें, कभी पुराने ज़माने की सादगी, कभी किसी भूली-बिसरी रीत का ज़िक्र, और बच्चे बड़े आँखों से सब सुनते हुए ख़ामोश हो जाते, मानो हर लफ़्ज़ अपने अंदर उतार लेना चाहते हों। जवानों की बातों में सपने होते, शहर जाने की तमन्ना, कुछ नया कर दिखाने की चाह, पर फिर भी उस पल में सबको यही लगता कि दुनिया की असली गर्माहट तो यहीं है, इसी अलाव के चारों तरफ़, जहाँ किसी को किसी से कुछ लेना नहीं, सिर्फ़ बाँटना है,वक़्त, बातें, मोहब्बत और अपनापन। कभी कोई पड़ोसी बिना बुलाए चला आता, बस दूर से आग की रोशनी देख कर समझ जाता कि महफ़िल जमी हुई है, और बिना झिझक घेर में जगह बना लेता, कोई नहीं पूछता क्यों आए हो, कितना वक़्त है, बस आ गए, यही काफ़ी था। आज जब वही सर्दियाँ लौटती हैं तो धुंध तो वहीं है, ठंडी हवा भी वैसी ही चलती है, पर नज़रें ढूँढती रह जाती हैं वो लकड़ियों के अलाव, वो गोल घेरा जिसमें उम्र, हैसियत, अमीरी-गरीबी का कोई फ़र्क़ नहीं होता था। अब गाँव के कई घरों के दरवाज़े बंद रहते हैं, बहुत से बच्चे शहरों में पढ़ाई या नौकरी में मशगूल हैं, बुज़ुर्ग अकेले चारपाई पर बैठकर दूर तक रास्ता निहारते रहते हैं। ठंड अब भी लगती है, हीटर और ब्लोअर भी चल पड़ते हैं, मगर उनकी गर्मी में वो रूहानी सुकून नहीं जो कभी दो जुमलों की गुफ़्तगू, एक हँसी, एक हल्की सी तसल्ली से मिल जाया करता था। रिश्तों में मोबाइल की रिंगटोन तो आ गई, पर आवाज़ में वो अपनापन कम हो गया, लोग हालचाल पूछते हैं, मगर आँखों में देखकर पूछने का दौर जैसे पीछे छूट गया। जो सर्दी पहले बहाना बनती थी एक-दूसरे के करीब बैठने का, अब कभी-कभी तन्हाई का सबब बन जाती है। दिल चाहता है फिर से वही दिन लौट आएँ जब शाम होते ही कोई आवाज़ लगाए , चलो, अलाव जलाने का वक़्त हो गया,और सब अपने-अपने घरों से धीरे-धीरे निकलकर एक जगह जमा हो जाएँ, कोई लकड़ी लाए, कोई सूखी पत्तियाँ, कोई चाय, कोई सिर्फ़ अपनी मुस्कुराहट। शायद ज़रूरत इस बात की नहीं कि वक़्त बदला है, ज़रूरत इस बात की है कि नीयत फिर से वैसी कर ली जाए जैसी पहले थी। अगर दिलों में फिर से वो जज़्बा जगा लिया जाए कि सर्दी की रातें किसी को अकेले न काटनी पड़ें, तो अलाव सिर्फ़ लकड़ी से नहीं, अपनेपन से भी जल उठेगा। तब फिर वही जाड़े की ठिठुरन भी मीठी लगेगी, फिर वही धुएँ की हल्की-सी चुभन भी अच्छी लगेगी, और हर चेहरे पर चिंगारियों की रोशनी के साथ एक बार फिर मोहब्बत का पुराना आलम नज़र आएगा, जैसे वक़्त ने खुद अपनी चाल थोड़ी धीमी कर दी हो ताकि इंसान एक-दूसरे के साथ बैठकर जी भर कर बातें कर सकें।

— डॉ. मुश्ताक़ अहमद शाह 

डॉ. मुश्ताक़ अहमद शाह

पिता का नाम: अशफ़ाक़ अहमद शाह जन्मतिथि: 24 जून जन्मस्थान: ग्राम बलड़ी, तहसील हरसूद, जिला खंडवा, मध्य प्रदेश कर्मभूमि: हरदा, मध्य प्रदेश स्थायी पता: मगरधा, जिला हरदा, पिन 461335 संपर्क: मोबाइल: 9993901625 ईमेल: dr.m.a.shaholo2@gmail.com शैक्षिक योग्यता एवं व्यवसाय शिक्षा,B.N.Y.S.बैचलर ऑफ़ नेचुरोपैथी एंड योगिक साइंस. बी.कॉम, एम.कॉम बी.एड. फार्मासिस्ट आयुर्वेद रत्न, सी.सी.एच. व्यवसाय: फार्मासिस्ट, भाषाई दक्षता एवं रुचियाँ भाषाएँ, हिंदी, उर्दू, अंग्रेज़ी रुचियाँ, गीत, ग़ज़ल एवं सामयिक लेखन अध्ययन एवं ज्ञानार्जन साहित्यिक परिवेश में रहना वालिद (पिता) से प्रेरित होकर ग़ज़ल लेखन पूर्व पद एवं सामाजिक योगदान, पूर्व प्राचार्य, ज्ञानदीप हाई स्कूल, मगरधा पूर्व प्रधान पाठक, उर्दू माध्यमिक शाला, बलड़ी ग्रामीण विकास विस्तार अधिकारी, बलड़ी कम्युनिटी हेल्थ वर्कर, मगरधा साहित्यिक यात्रा लेखन का अनुभव: 30 वर्षों से निरंतर लेखन प्रकाशित रचनाएँ: 2000+ कविताएँ, ग़ज़लें, सामयिक लेख प्रकाशन, निरन्तर, द ग्राम टू डे, दी वूमंस एक्सप्रेस, एजुकेशनल समाचार पत्र (पटना), संस्कार धनी (जबलपुर),जबलपुर दर्पण, सुबह प्रकाश , दैनिक दोपहर,संस्कार न्यूज,नई रोशनी समाचार पत्र,परिवहन विशेष,समाचार पत्र, घटती घटना समाचार पत्र,कोल फील्ड मिरर (पश्चिम बंगाल), अनोख तीर (हरदा), दक्सिन समाचार पत्र, नगसर संवाद, नगर कथा साप्ताहिक (इटारसी) दैनिक भास्कर, नवदुनिया, चौथा संसार, दैनिक जागरण, मंथन (बुरहानपुर), कोरकू देशम (टिमरनी) में स्थायी कॉलम अन्य कई पत्र-पत्रिकाओं में निरंतर रचनाएँ प्रकाशित प्रकाशित पुस्तकें एवं साझा संग्रह साझा संग्रह (प्रमुख), मधुमालती, कोविड, काव्य ज्योति, जहाँ न पहुँचे रवि, दोहा ज्योति, गुलसितां, 21वीं सदी के 11 कवि, काव्य दर्पण, जहाँ न पहुँचे कवि (रवीना प्रकाशन) उर्विल, स्वर्णाभ, अमल तास, गुलमोहर, मेरी क़लम से, मेरी अनुभूति, मेरी अभिव्यक्ति, बेटियां, कोहिनूर, कविता बोलती है, हिंदी हैं हम, क़लम का कमाल, शब्द मेरे, तिरंगा ऊंचा रहे हमारा (मधुशाला प्रकाशन) अल्फ़ाज़ शब्दों का पिटारा, तहरीरें कुछ सुलझी कुछ न अनसुलझी (जील इन फिक्स पब्लिकेशन) व्यक्तिगत ग़ज़ल संग्रह: तुम भुलाये क्यों नहीं जाते तेरी नाराज़गी और मेरी ग़ज़लें तेरा इंतज़ार आज भी है (नवीनतम) पाँच नए ग़ज़ल संग्रह प्रकाशनाधीन सम्मान एवं पुरस्कार साहित्यिक योगदान के लिए अनेक सम्मान एवं पुरस्कार प्राप्त पाठकों का स्नेह, साहित्यिक मंचों से मान्यता मुश्ताक़ अहमद शाह जी का साहित्यिक और सामाजिक योगदान न केवल मध्य प्रदेश, बल्कि पूरे हिंदी-उर्दू साहित्य जगत के लिए गर्व का विषय है। आपकी लेखनी ने समाज को संवेदनशीलता, प्रेम और मानवीय मूल्यों से जोड़ा है। आपके द्वारा रचित ग़ज़लें और कविताएँ आज भी पाठकों के मन को छूती हैं और साहित्य को नई दिशा देती हैं।