इज़्ज़त की डिलीवरी
वह साइकिल नहीं चलाता था,
वह समय को थामे चलता था।
थैले में सिर्फ़ ख़त नहीं होते थे,
किसी माँ की प्रतीक्षा,
किसी बेटे का सपना होता था।
ख़ाकी कपड़ों में लिपटा आदमी,
नक़्शों से बड़ा भरोसा था।
नाम लेकर बुलाया जाता था,
क्योंकि हर गली से रिश्ता था।
आज समय उड़ता है पंखों पर,
पर ठहराव मर गया है।
डिलीवरी हो गई है पेशा,
पर पेशे में आदमी मर गया है।
जो इज़्ज़त पद से नहीं,
कर्तव्य से उपजती थी—
वह तेज़ी की चकाचौंध में
चुपचाप कुचली गई है।
कहना बस इतना है सभ्यता से—
अगर ख़त फिर कभी लिखो,
तो पता केवल घर का नहीं,
आदमी का सम्मान भी लिखो।
वो जो ख़ामोशी से ख़त पहुँचा जाता था,
असल में भरोसा पहुँचाया जाता था।
आज आवाज़ तेज़ है, समय कम है—
पर आदमी कहीं रास्ते में गिरा जाता है।
— डॉ प्रियंका सौरभ
