गीतिका/ग़ज़ल

ग़ज़ल

जाल – जंजाल है
हाल भी बेहाल है

मुद्दतों से कट रही है
ऐसे ही, कमाल है ।

अश्क है , न रस्क है
ये आँख यूं ही लाल है

देख के न देखने की
हाँ , हमे मलाल है

जोड़ते रहे जो कभी
टूटने का साल है ।

होठ हंस पड़ें तो क्या
न सोचिए निहाल है

जुम्बिश-ए-जां है अगर
तो उनका ही ख्याल है ।।

— साधना सिंह

साधना सिंह

मै साधना सिंह, युपी के एक शहर गोरखपुर से हु । लिखने का शौक कॉलेज से ही था । मै किसी भी विधा से अनभिज्ञ हु बस अपने एहसास कागज पर उतार देती हु । कुछ पंक्तियो मे - छंदमुक्त हो या छंदबध मुझे क्या पता ये पंक्तिया बस एहसास है तुम्हारे होने का तुम्हे खोने का कोई एहसास जब जेहन मे संवरता है वही शब्द बन कर कागज पर निखरता है । धन्यवाद :)