कविता

उद्धारक बनने की काबिलियत

हां… वो आदमी सख्त है,
धार्मिक है, भक्त है,
कई तरह के लांछनों में डूबा है,
पर किसी भी प्रकार का आरोप
उसे बिल्कुल पसंद नहीं।
लूट-खसोट उसे बर्दाश्त नहीं,
मगर रिश्वत लेने से गुरेज नहीं।
इंसानियत उसे पता है,
पर निभाने की फुर्सत नहीं।
दुनियादारी जानता है,
पर निभाए क्यों?
क्यों सबसे हाथ मिलाए?
जिंदगी उसने गुजारी है बिना अभाव,
हर जगह उसका ही प्रभाव।
इसलिए कोई भी चीज
उठा लेता है बिना खरीदे,
और पीड़ितों से
अपने ही कसीदे पढ़वाता है।
नशे में चूर होने के बाद ही
उसे शराब से नफरत होती है,
पर राजस्व के लिए
इसे महती आवश्यकता बताता है।
देश सर्वोपरि है उसके लिए,
तभी तो देश का अकूत धन
स्विस बैंक में रख छोड़ा है।
जातीय एकता की दुहाई देता है,
पर अस्पृश्यों से नफरत करता है।

और हम…
हम उसे नेता कहते हैं,
मार्गदर्शक कहते हैं,
मसीहा कहते हैं
हां!
वही हमारा असली “उद्धारक” है,
जिसमें उद्धारक बनने की
सारी काबिलियत मौजूद है।

— राजेन्द्र लाहिरी

राजेन्द्र लाहिरी

पामगढ़, जिला जांजगीर चाम्पा, छ. ग.495554