राजा ही जब डसने लगता
राजा ही जब डसने लगता।
ज़हर उगल हँसने लगता।
सर्पदंश दे काट रहा है।
अलग शगूफे बांट रहा है।
केवट की नैया में केवट,
राम बनें अब राम के सेवक।
आस अधूरी शबरी की कह, नई कथा गढ़ने लगता।
राजा ही जब डसने लगता…….
समता के पहरेदारों को,
अंधों के चौकीदारों को।
बैठाया है जब आसन पर,
कसता नकेल अनुशासन पर।
बन के राजा धृतराष्ट्र वही, जब जबड़ों को कसने लगता।
राजा ही जब डसने लगता…….
इसी ‘सवर्ण’ की बैठ पीठ पर।
बन बैठा है मठाधीश पर।
पेड़ वही वो काट रहा है,
टहनी सारी छांट रहा है।
आरक्षण की आरी को, वो ‘अनहद’ ही घिसने लगता।
राजा ही जब डसने लगता…….
— गुंजन अग्रवाल अनहद
