कविता

सोचा था

अच्छा था, सोचा था
समय भी था, आनंदमय भी था
पता भी न चला, बीत भी गया !

खपा था, लगा था
सफ़र भी अधूरा था,
हमसफ़र भी सरफिरा था
गाड़ी ही छूट गया,
मंजिल भी रूठ गया !

इंतजार भी था, प्रतीक्षा भी था
किया समीक्षा भी था
उसका था, किसका था
पता भी न चला,बीत भी गया !

हैरानी भी था, छटपटाहट भी था
बदनामी भी था, घबराहट भी था
क्यों था, किसका था
पता भी न चला, बीत भी गया !

जिस प्रेम को चाहा था
बहुत ही सराहा था
मन ही मन छुपाया था !

जिस घर को चाहा था
बहुत ही सराहा था
किसी और का हो गया
पता भी न चला, छूट भी गया !!

— मनोज शाह मानस

मनोज शाह 'मानस'

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