गीतिका/ग़ज़ल

मरुस्थल

स्वच्छ हवा – जल माँग रहे हो।
हरा मरुस्थल माँग रहे हो।
नदियों में गंदगी पटी है,
मोहक कल – कल माँग रहे हो।
नागफनी गमलों में बोयी,
तुलसी के दल माँग रहे हो।
वर्तमान धूमिल करते हो,
आगत उज्ज्वल माँग रहे हो।
अरावली छलनी कर डाली,
अब विंध्याचल माँग रहे हो।
शेष न रहे सघन तरु पथ पर,
छाया शीतल माँग रहे हो।

— गौरीशंकर वैश्य विनम्र

*गौरीशंकर वैश्य विनम्र

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