कविता
मैं भी कभी जिन्दगी से छू मंतर हो जाऊंगी
अपनी सपनों की दुनिया बनाऊंगी और उसमें खो जाऊंगी
अनकही, अनसुलझी दासता बन जाऊंगी
मैं भी कभी जिन्दगी से छू मंतर हो जाऊंगी
जहां सिर्फ सुकून होगा और एक प्यारी सी दुनिया होगी
ईर्ष्या से दूर, बस लगाव होगा
ढेर सारे रंग, ढेर सारी मौज होगी
मैं भी कभी जिन्दगी से छू मंतर हो जाऊंगी
उस जिन्दगी में मेरे बनाए गए नियम होंगे
जिनसे सभी खुश होंगे
और जीवन में हमेशा खुशहाली होगी
मैं भी कभी जिन्दगी से छू मंतर हो जाऊंगी
और एक प्यारी सी दुनिया बनाऊंगी…
— गंगा मांझी
