धर्म-संस्कृति-अध्यात्म

होली,परंपरा का अमर रंग या समय की बदलती छटा?

भारतीय संस्कृति में होली का ज़िक्र वेदों से मिलता है। ऋग्वेद में ‘फाल्गुनी पूर्णिमा’ का उल्लेख है, जो वसंत का स्वागत करती थी। पुराणों में प्रह्लाद-होलिका की कथा बुराई पर अच्छाई की जीत का प्रतीक बनी। ब्रज की होली में राधा-कृष्ण की लीला भक्ति का आह्वान करती—लठमार होली, फूलों वाली होली। पोंगल से जुड़ी रंगारंग परंपराएं। गांवों में यह सामुदायिक उत्सव होता था, महिलाएं गीत गातीं, पुरुष ढोल बजाते, और सभी वर्ण-जाति भूलकर रंग लगाते। फागुन का गुलाल प्राकृतिक,टेसू के फूल, हल्दी-अबीर से बना। अपनापन ऐसा कि दुश्मनी मिट जाती, मेल-मिलाप नया जीवन देता। समय का चक्र रुकता, बस प्रेम और क्षमा बहती।मध्यकालीन भारत, भक्ति और लोक संस्कृति का संगम मुगल काल में होली सूफी-संत परंपरा से रंगी। अमीर खुसरो ने फाग गीत रचे, तानसेन ने होली को रंगों में बहाया । राजस्थान की धुलंडी, बुंदेलखंड की फागुहा—ये क्षेत्रीय विविधताएं भारतीय परिवेश की समृद्धि दर्शातीं। बंगाल में होली यात्रा, महाराष्ट्र में रंगपंचमी। यह त्योहार सामाजिक समरसता का प्रतीक था, राजा-प्रजा एक हो जाते। तब होली पर्यावरण अनुकूल थी,जल की बर्बादी नहीं, रासायनिक रंगों का नामोनिशान नहीं। परिवार केंद्रित, जहां दादा-दादी की कहानियां नई पीढ़ी को संस्कार देतीं।
आधुनिक भारत,,शहरीकरण और वैश्वीकरण का प्रभाव,, आज़ादी के बाद औद्योगीकरण ने होली को बदला। 1980-90 के दशक में रंगीन टीवी ने बॉलीवुड होली (‘रंग बरसे’, ‘होली खेलें’) को लोकप्रिय बनाया, लेकिन व्यावसायिक। अब अमेजन-फ्लिपकार्ट पर पैक रंग बिकते हैं—
,चीनी-सीसे युक्त, त्वचा रोग पैदा करने वाले। पानी की होली में करोड़ों लीटर पानी बर्बाद, जबकि जल संकट सामने दिख रहा है। सोशल मीडिया ने अपनापन चुराया इंस्टाग्राम रील्स पर होली, लेकिन पड़ोसी से दूरी। महानगरों में पार्टीज, क्लब होली, गांवों में भी डीजे ने ढोल को हाशिए पर धकेल दिया। कोविड जैसे संकटों ने वर्चुअल होली लाई, जो सुविधाजनक लेकिन भावहीन।छत्तीसगढ़ जैसे राज्यों में स्थानीय स्वाद बचा है,रायपुर-भिलाई में फागुनोत्सव, बस्तर की आदिवासी होली में मंडला नृत्य। लेकिन यहां भी प्लास्टिक गुलाल और शराबी उन्माद बढ़ा। आंकड़े बताते हैं, पर्यावरण मंत्रालय के अनुसार, होली पर 20% प्रदूषण बढ़ता है। अपनापन घटा क्योंकि संयुक्त परिवार टूटे, माइग्रेशन बढ़ा।क्यों बदले हालात? कारण और चुनौतियां शहरीकरण, 40% आबादी शहरों में, जगह कम, रिश्ते औपचारिक।वैश्वीकरण,वेस्टर्न पार्टी कल्चर घुसा, परंपरा पीछे।पर्यावरण संकट,जल-वायु परिवर्तन ने प्राकृतिक रंग सीमित किए।आर्थिक दबाव, महंगाई ने सादगी छीनी, लग्जरी होली लाई।तकनीकी प्रभाव स्क्रीन टाइम बढ़ा, आमने-सामने कम।फिर भी, सकारात्मक बदलाव हैं। ‘ग्रीन होली’ अभियान आयुष मंत्रालय योग-सहित होली प्रोत्साहित कर रहा। युवा आर्गनिक रंग बना रहे, एनजीओ जल संरक्षण सिखा रहे। परंपरा को नया जीवन दें ,होली अभी भी भारतीय आत्मा है, बस रूप बदल गया। हमें चाहिए संतुलन ,प्राकृतिक रंग, सांस्कृतिक कार्यक्रम, और अपनापन। स्थानीय परंपराओं को जागृत करें। तभी फागुन का गुलाल फिर प्रेम की वर्षा करेगा। आइए, होली को समय के साथ ढालें, न कि खो दें। जय हो!

— डॉ. मुश्ताक़ अहमद शाह

डॉ. मुश्ताक़ अहमद शाह

पिता का नाम: अशफ़ाक़ अहमद शाह जन्मतिथि: 24 जून जन्मस्थान: ग्राम बलड़ी, तहसील हरसूद, जिला खंडवा, मध्य प्रदेश कर्मभूमि: हरदा, मध्य प्रदेश स्थायी पता: मगरधा, जिला हरदा, पिन 461335 संपर्क: मोबाइल: 9993901625 ईमेल: dr.m.a.shaholo2@gmail.com शैक्षिक योग्यता एवं व्यवसाय शिक्षा,B.N.Y.S.बैचलर ऑफ़ नेचुरोपैथी एंड योगिक साइंस. बी.कॉम, एम.कॉम बी.एड. फार्मासिस्ट आयुर्वेद रत्न, सी.सी.एच. व्यवसाय: फार्मासिस्ट, भाषाई दक्षता एवं रुचियाँ भाषाएँ, हिंदी, उर्दू, अंग्रेज़ी रुचियाँ, गीत, ग़ज़ल एवं सामयिक लेखन अध्ययन एवं ज्ञानार्जन साहित्यिक परिवेश में रहना वालिद (पिता) से प्रेरित होकर ग़ज़ल लेखन पूर्व पद एवं सामाजिक योगदान, पूर्व प्राचार्य, ज्ञानदीप हाई स्कूल, मगरधा पूर्व प्रधान पाठक, उर्दू माध्यमिक शाला, बलड़ी ग्रामीण विकास विस्तार अधिकारी, बलड़ी कम्युनिटी हेल्थ वर्कर, मगरधा साहित्यिक यात्रा लेखन का अनुभव: 30 वर्षों से निरंतर लेखन प्रकाशित रचनाएँ: 2000+ कविताएँ, ग़ज़लें, सामयिक लेख प्रकाशन, निरन्तर, द ग्राम टू डे, दी वूमंस एक्सप्रेस, एजुकेशनल समाचार पत्र (पटना), संस्कार धनी (जबलपुर),जबलपुर दर्पण, सुबह प्रकाश , दैनिक दोपहर,संस्कार न्यूज,नई रोशनी समाचार पत्र,परिवहन विशेष,समाचार पत्र, घटती घटना समाचार पत्र,कोल फील्ड मिरर (पश्चिम बंगाल), अनोख तीर (हरदा), दक्सिन समाचार पत्र, नगसर संवाद, नगर कथा साप्ताहिक (इटारसी) दैनिक भास्कर, नवदुनिया, चौथा संसार, दैनिक जागरण, मंथन (बुरहानपुर), कोरकू देशम (टिमरनी) में स्थायी कॉलम अन्य कई पत्र-पत्रिकाओं में निरंतर रचनाएँ प्रकाशित प्रकाशित पुस्तकें एवं साझा संग्रह साझा संग्रह (प्रमुख), मधुमालती, कोविड, काव्य ज्योति, जहाँ न पहुँचे रवि, दोहा ज्योति, गुलसितां, 21वीं सदी के 11 कवि, काव्य दर्पण, जहाँ न पहुँचे कवि (रवीना प्रकाशन) उर्विल, स्वर्णाभ, अमल तास, गुलमोहर, मेरी क़लम से, मेरी अनुभूति, मेरी अभिव्यक्ति, बेटियां, कोहिनूर, कविता बोलती है, हिंदी हैं हम, क़लम का कमाल, शब्द मेरे, तिरंगा ऊंचा रहे हमारा (मधुशाला प्रकाशन) अल्फ़ाज़ शब्दों का पिटारा, तहरीरें कुछ सुलझी कुछ न अनसुलझी (जील इन फिक्स पब्लिकेशन) व्यक्तिगत ग़ज़ल संग्रह: तुम भुलाये क्यों नहीं जाते तेरी नाराज़गी और मेरी ग़ज़लें तेरा इंतज़ार आज भी है (नवीनतम) पाँच नए ग़ज़ल संग्रह प्रकाशनाधीन सम्मान एवं पुरस्कार साहित्यिक योगदान के लिए अनेक सम्मान एवं पुरस्कार प्राप्त पाठकों का स्नेह, साहित्यिक मंचों से मान्यता मुश्ताक़ अहमद शाह जी का साहित्यिक और सामाजिक योगदान न केवल मध्य प्रदेश, बल्कि पूरे हिंदी-उर्दू साहित्य जगत के लिए गर्व का विषय है। आपकी लेखनी ने समाज को संवेदनशीलता, प्रेम और मानवीय मूल्यों से जोड़ा है। आपके द्वारा रचित ग़ज़लें और कविताएँ आज भी पाठकों के मन को छूती हैं और साहित्य को नई दिशा देती हैं।