मुफ़्त का नशा
बुधिया के गाँव में सरकारी योजनाएं आईं — राशन, गैस, बिजली बिल माफी, नकद। बुधिया खुश था।
पहले साल उसने काम छोड़ा। “मिल तो रहा है।”
दूसरे साल उसने खेत पड़ोसी को दे दिया। “मेहनत किसलिए?”
तीसरे साल उसके बेटे ने स्कूल छोड़ा। “पढ़कर क्या करेंगे, फ़्री में सब मिलेगा।”
पाँच साल बाद चुनाव आए। नेताजी गाँव में आए। “इस बार और देंगे — मोबाइल, साइकिल, पचास हज़ार नकद।”
“और काम?” किसी ने पूछा।
“काम? वो तुम करोगे तो हम देंगे क्यों?”
बुधिया ने ताली बजाई। पर उसके हाथ अब उतने मजबूत नहीं थे — पाँच साल की बेकारी ने उन्हें ढीला कर दिया था। उसका बेटा अब नेता के जुलूस में झंडा उठाता था। “बाबा, यह भी एक काम है।”
“हाँ बेटा। पर इसमें रीढ़ नहीं लगती — घुटने लगते हैं।”
बुधिया ने पहली बार खुद पर शर्म महसूस की। पर तब तक मुफ़्त का नशा इतना गहरा हो चुका था कि उठने की इच्छा ही मर चुकी थी। मुफ़्त में मिली रोटी पेट भरती है, पर रीढ़ तोड़ती है — और रीढ़ टूटी रहे, यही तो सत्ता चाहती है।
— डॉ. शैलेश शुक्ला
