कविता

नारी घर की शान

नारी गौरव-संस्कृति की अमर धरोहर,
शक्ति-स्नेह, समर्पण-स्वाभिमान से भरपूर,
संस्कृति की शान, उससे ही जग में सम्मान,
ममता की गंगा नारी, अभिमान से रहती दूर

नारी घर की शान है, सृष्टि दिव्य आधार,
उस से ही है चहकता, अद्भुत ये सारा संसार,
महिला घर की शान है, नर उसका अभिमान,
दोनों से मिल कर बना, सारा जगत महान।

विहंगम दृष्टि से देख जगत को चेतन नारी,
सजग-सशक्त हुई, पहचान न अपनी भूली है,
नाच चुकी फिरकी-सम अब तक कितना ही,
अब सुदृढ़ संकल्प ले निज मंजिल चुन ली है।

तोड़के रक्तरंजित बेड़ियां हाथों में अब लाठी ली,
संकल्पों की ज्वाला से जो अपने लक्ष्यों को पाए,
नहीं रुकेगी आज की नारी आगे कदम बढ़ाएगी,
नहीं रही वह अब बेचारी कांटों में भी फूल खिलाए।

— लीला तिवानी

*लीला तिवानी

लेखक/रचनाकार: लीला तिवानी। शिक्षा हिंदी में एम.ए., एम.एड.। कई वर्षों से हिंदी अध्यापन के पश्चात रिटायर्ड। दिल्ली राज्य स्तर पर तथा राष्ट्रीय स्तर पर दो शोधपत्र पुरस्कृत। हिंदी-सिंधी भाषा में पुस्तकें प्रकाशित। अनेक पत्र-पत्रिकाओं में नियमित रूप से रचनाएं प्रकाशित होती रहती हैं। लीला तिवानी 57, बैंक अपार्टमेंट्स, प्लॉट नं. 22, सैक्टर- 4 द्वारका, नई दिल्ली पिन कोड- 110078 मोबाइल- +91 98681 25244