ग़ज़ल
तोड़ कर तारे ज़मीं पर आज ला सकता हूँ मैं
तुम इशारा भी करो तो जां लुटा सकता हूँ मैं
इब्तिदा-ए-इश्क़ है, हर शय हसीं लगती है अब
रोज़ो-शब बातें तुम्हारी सुन, सुना सकता हूँ मैं
फूल तुम और मैं मधुप-सा, है चमन गुलज़ार अब
गीत मधुरिम तान पर अब गुनगुना सकता हूँ मैं
चार दिन की चाँदनी कहती है दुनिया इश्क़ को
पर तुम्हारे प्यार में सदियाँ बिता सकता हूँ मैं
आज़माना हो अगर तो आज़मा कर देख लो
लैला-मजनूं की भी हद से पार जा सकता हूँ मैं
करके वा’दा भूल जाना है रवायत आजकल
पर सभी क़समें, सभी रस्में निभा सकता हूँ मैं
मत समझना कोरी बातें हैं मेरे अल्फ़ाज़ ये
हैं निहां जज़्बात भी, बस ये बता सकता हूँ मैं
— पूनम माटिया
