कविता

नेह-विटप

चलो आज कुछ स्वप्न बुनें,
मन-उपवन से पुष्प चुनें,
कर लें सूक्ष्म संचय हम,
मृदा-हृदय में भाव गुनें।

जब अंकुरित हों भाव-सुमन,
नेह-जल से हों सिंचित तन,
सहेजूँ स्पंदन अंजूरी भर
हँस उठे हरितिम मधुवन।

जब-जब आए मधुप अलि,
पार्श्व बसाऊँ लज्जित कलि,
प्रीत-मकरंद संजो,
उड़े गगन ले सुवास चली।

पुष्प-पंखुरी से पुनः,
बीज रूप धरें जीवन,
मृदा-मिलन में लीन हो,
वृहत् वृक्ष से विकसित वन।

यह क्रम अनवरत ही चले ,
नव-रूपों में जीवन ढले,
यह शाश्वत गति अविचल,
लहरित हो सृष्टि के तले।

हम भी कुछ संकल्प गढ़ें,
संग-संग कुछ स्वप्न जड़ें,
स्नेह-लेपित धरा-तन पर,
एक प्रीति-विटप विकसित करें।

छाया तले फिर संग मिलें,
शांत हों संताप के छले,
जड़ दृढ़ हो अंतर-तल में,
ताप-दाह सब दूर चले।

दुःखाग्नि में दीप जले,
नेह-सिक्त उर दृढ़ पले,
मार्ग कठिन यदि आ पड़े,
पग न रुके, संकल्प चले।

— सविता सिंह मीरा

*सविता सिंह 'मीरा'

जन्म तिथि -23 सितंबर शिक्षा- स्नातकोत्तर साहित्यिक गतिविधियां - विभिन्न पत्र पत्रिकाओं में रचनाएं प्रकाशित व्यवसाय - निजी संस्थान में कार्यरत झारखंड जमशेदपुर संपर्क संख्या - 9430776517 ई - मेल - meerajsr2309@gmail.com

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