जीती-जागती चुनौती
सुबह की धुंध में
सपने आँखें खोलते हैं
थकती राहों पर भी
कदम नहीं रुकते हैं
हवा में प्रश्न हैं
और समय के निशान
हर मोड़ पर खड़ा है
एक नया इम्तिहान
टूटते विश्वासों में
फिर से आशा उगती है
चुप्पियों के भीतर भी
एक धड़कन जगती है
पत्थरों की राहें हैं
फिर भी फूल खिलते हैं
अंधेरों की जिद में
दीये रोज जलते हैं
सागर की लहरों सा
मन बार-बार उठता है
हर गिरकर भी जीवन
फिर से आगे बढ़ता है
संघर्ष की धरती पर
सपने सांस लेते हैं
हर चुनौती के भीतर
नए अर्थ जी लेते हैं
— डॉ. अशोक
