कविता

स्त्री केवल आकार नहीं

नहीं लिखी गईं वंदनाएँ
नील गगन को छूती नारी पर,

नहीं जले शब्दों के दीपक
सूत्र सुलझाती बुद्धि-कुमारी पर।

नहीं बजे जय-घोष सभाओं में
अन्न जुटाती गृह-श्रमिका के,
नहीं गिने गए मौन तपस्या के
क्षण-क्षण जलते दीप शिखा के।

कितने दरिद्र रहे वे लोचन,
जो देह-द्वार पर ही रुक आए,
मन-मंदिर की ज्योति न देखी,
सागर-समान हृदय न पहचान पाए।

मैंने देखा—
उसके आँचल में नभ की सीमा,
उसकी दृष्टि में ज्ञान अपार,
उसकी करुणा में जग का स्पंदन,
उसके श्रम में जीवन-सार।

स्त्री केवल आकार नहीं है,
वह संवेदित सृष्टि-विस्तार,
जो उसको तन तक बाँधें,
वे खो देते सारा संसार।

— डॉ. प्रियंका सौरभ

*डॉ. प्रियंका सौरभ

रिसर्च स्कॉलर इन पोलिटिकल साइंस, कवयित्री, स्वतंत्र पत्रकार एवं स्तंभकार, (मो.) 7015375570 (वार्ता+वाट्स एप) facebook - https://www.facebook.com/PriyankaSaurabh20/ twitter- https://twitter.com/pari_saurabh

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