कृत्य और बर्बादी
यौवन कभी तो घटेगा,
बिजली संयंत्र का बायलर कभी तो फटेगा,
तब नहीं होगा मुझे किसी प्रकार का आश्चर्य,
वो दिन भी होगा सामान्य दिन
नहीं समझूंगा कोई विशेष तिथि पर्व,
क्योंकि आग इस कदर जलाया जा रहा है,
हर किसी के द्वारा घी का होम दे
आग भड़काया जा रहा है,
नहीं मतलब किसी को देश धर्म राग से,
सब संतुष्ट है भड़कती हुई आग से,
नहीं पड़ना फर्क कहां लगी है आग,
हर कोई भड़का रहा अग्नि धवल आग,
मतलब नहीं ये आग कब कहां किसे जलायेगा,
जहां ए दौर में कैसा मंजर लाएगा,
वस्तु स्थिति का सामना करने बैठा है हर कोई तैयार,
ग्रस्त है मानसिक रोग से राष्ट्र यार
किंचित हृदय स्पंदन नहीं हो रहा है,
हर हिय एक बकवास ढो रहा है,
जिए जा रहा लेकर मन में इक आस,
संपूर्ण लग रहा सबको किसी का बकवास,
कुकृत्य कुछ अंधों की आबादी बढ़ाता है,
समग्र रूप से सोचो
ऐसा हर कृत्य महा बर्बादी लाता है।
— राजेन्द्र लाहिरी
