गीत/नवगीत

विश्व हास्य दिवस ०३ मई – उन्मुक्त हॅसी

रोज मर्रा की इस भाग दौड़ में
बनावटी पन के इस विकट दौर में
ज़िन्दगी तू किस मोड़ पर आ फंसी
कहां खो गयी वह उन्मुक्त हॅसी।।

पहले छोटी बात पर मिल जाती थी
मन की कली सहज खिल जाती थी
अरी अब तू कहां जाकर के रे धंसी
कहां खो गयी वह उन्मुक्त हॅसी ।।

तू तो है तमाम गुणों की खान
कैसे तेरी खूबियां करूं मैं बखान
नही कोई अन्य दवा तेरे जैसी
कहां खो गयी वह उन्मुक्त हॅसी।।

कई बार आंख में आंसू तक आ जाते
हंसते-हंसते ऐसे लोटपोट हो जाते
पल भर में दूर हो जाती सारी बेबसी
कहां खो गयी वह उन्मुक्त हॅसी ।

जब मौका मिले तू फिर चली आना
अड़ोस-पड़ोस में किसी को न बताना
कैसी जंजीर और बेड़ियों में तू कसी
कहां खो गयी वह उन्मुक्त हॅसी।।

तेरे आते ही रौनक, स्वत: आ जाएगी
‌ उदासी दुम दबाकर भाग जाएगी
यूं तो चलती ही रहेगी यह रस्साकसी
कहां खो गयी वह उन्मुक्त हॅसी।।
कहां खो गयी वह उन्मुक्त हॅसी।।

— नवल अग्रवाल

*नवल किशोर अग्रवाल

इलाहाबाद बैंक से अवकाश प्राप्त पलावा, मुम्बई

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