वक्त बदलता दे रहा, कैसे-कैसे घाव
वक्त बदलता दे रहा, कैसे-कैसे घाव,
माली बाग़ उजाड़ते, मांझी खोए नाव॥
अपनों से अपने नहीं, रखते आज लगाव,
रिश्तों की हर डाल पर, सूख गया अब भाव।
विश्वासों की धूप में, जलते रहे अभाव—
वक्त बदलता दे रहा, कैसे-कैसे घाव॥
लोभ-लालसा की लहर, बहा रही सद्भाव,
चौराहे पर सच खड़ा, ढूँढे अपना ठाव।
झूठों की इस भीड़ में, खोता हर प्रभाव—
वक्त बदलता दे रहा, कैसे-कैसे घाव॥
धर्म-नीति के नाम पर, बिखरा अब हर गाँव,
नेकी पीछे रह गई, आगे बढ़ता दाँव।
मन के मंदिर टूटते, देहरी पर अलगाव—
वक्त बदलता दे रहा, कैसे-कैसे घाव॥
जागो अब इंसान तुम, बदलो अपना भाव,
प्रेम-दीप फिर से जले, मिटे हृदय के घाव।
तभी खिलेगी जिंदगी, लौटेगा फिर चाव—
वक्त बदलता दे रहा, कैसे-कैसे घाव॥
— डॉ. सत्यवान सौरभ
