तलाश बाकी है
मै बरसों से लिख रही हूँ
मगर अभी तक मुझे,
वो नही मिला जिसकी
कब से तलाश है?
रह – रहकर मै खुद को
टटोलता रहता हूँ।
आईने को देखकर खुद से ही
बोलता रहता हूँ।
धुंधला गया है ये आईना भी
मिलने की आस है
हाँ कब से तलाश है?
ना जाने कब लिखेंगी
मेरी कलम वो सच
जो मेरा अंतर्मन खोज रहा है।
उसी सच के लिए बचाकर रखी
मैने थोड़ी सी सांस है
हाँ कब से तलाश है?
— निधि ‘मानसिंह’
