बसंती हवा चली है
बसंती हवा चली है
झूम के चली है।
गीत गाकर चली है,
खिलखिलाकर चली है।
खेतों से होकर,
बागों से मिलकर।
गलियों में चली है,
फूलों पर चली है।
सखियों से मिलने,
साथ-साथ चलने।
बच्चों से खेलने चली है,
मेंहदी रचाने चली है।
खुशबू तन में लपेटे हुए
बारात में झूमते हुए।
सबको हिलाते चली है,
शीतल हवा चली है।
सबको हंसाते हुए,
अंजुरी में पानी लेते हुए।
सब पर छिड़कते चली है,
बसंती हवा मुस्काते चली है।
— जयचन्द प्रजापति ‘जय’
