गज़ल
चले आते हैं इन गलियों में अक्सर दीवानों की तरह,
इस मिट्टी में अपना घर होने का एहसास होता है।
बरसों शहर में रहकर भी हम शहर के हो न सके,
गाँव और कस्बे में बिताया हर लम्हा ख़ास होता है।
तमाम साज़ो-सामान जोड़े हमने, खुश रहने की ख़ातिर,
एसी की हवा में भी बेनवा की याद से मन उदास होता है।
रिश्ते तो बहुत बने शहर में, पर स्वार्थ की दूरियाँ रहीं,
अपनों से अपनेपन का रिश्ता ही दिल के पास होता है।
भीड़ में रहकर भी अक्सर हम तन्हा ही रह जाते हैं,
हर शख़्स के चेहरे पर मुखौटों का आभास होता है।
जब लौटते हैं यादों में अपने गाँव की पगडंडियों पर,
हर कोना, हर आँगन जीता-जागता इतिहास होता है।
— डॉ. शैलेश शुक्ला
