पुष्कर में तपस्या
धधकती धूनी, तपता गगन,
मौन साधना में लीन है तन।
राख में लिपटी आँखें है बंद,
मन पहुँचा किसी और छंद।
विदेशी होकर भी अपनापन,
भारत की ‘मिट्टी’ का स्पंदन।
अग्नि-ज्वाला ‘संग’ बैठी वह,
ढूँढते रही भीतर का जीवन।
ना शब्दों का यहाँ कोई शोर,
ना ‘इच्छाओं’ का कोई छोर।
केवल तप, त्याग और ध्यान,
जग से दूर, आत्मा का ज्ञान।
अब सूरज भी झुककर देखे,
कैसा है यह कठिन विधान।
पुष्कर में 21 दिनी ‘तपस्या’,
नहीं चिंता क्या हो परिणाम।
(संदर्भ – खड़ेश्वरी तपस्या करती रूस की साधिका)
— संजय एम तराणेकर
