यदि मैं स्मृति बन जाऊँ
कभी-कभी मन की देहरी पर
एक मौन प्रश्न आकर ठहर जाता है
कि… यदि एक दिन
मैं केवल स्मृति बन जाऊँ
तो क्या मेरी आवाज़
घर की दीवारों में देर तक गूँजेगी
क्या रसोई की धीमी खनक में
दरवाज़ों की आहट में
या साँझ की थकी हुई चुप्पियों में
कोई पलभर को मुझे ढूँढ़ेगा
क्या “ज़रा सुनो…” कहकर
मुझे पुकारने वाले स्वर
एक दिन अधूरे रह जाएँगे
और फिर समय की धूल तले
धीरे-धीरे मेरे होने के निशान ढक जाएँगे
शायद कुछ रातें
भीगी पलकों के साथ जागेंगी
कुछ बातें तस्वीरों से कही जाएँगी
फिर जीवन अपनी आदत के अनुसार
सबको जीना सिखा ही देगा
क्योंकि… रुकता तो कुछ भी नहीं
न समय, न लोग और न ही साँसें
पर… यदि कभी मैं स्मृति बन जाऊँ
तो मुझे आँसुओं में मत ढूँढ़ना
तो मुझे आँसुओं में नहीं
उन मुस्कानों में याद करना
जहाँ अनायास मेरा नाम
तुम्हारे होंठों तक आ जाए
— डॉ. सारिका ठाकुर ‘जागृति’
