धर्म-संस्कृति-अध्यात्म

कला और संस्कृति में बिहार का योगदान 

बिहार में कला की विरासत पुरानी तथा समृद्ध है इसकी संस्कृति भी प्राचीन तथा वैविध्यपूर्ण है। पुरातात्विक काल के उत्खनन और सर्वेक्षण में महत्वपूर्ण कलाकृतियां शैल -चित्र है जिसके साक्ष्य कैमूर, जमुई तथा नवादा में मिले।छठी शताब्दी ईसापूर्व साक्ष्यो में राजगीर के प्राचीर है।

कला को तीन भागों में बांटा जा सकता है– 1 प्राचीन काल 2 मध्य काल 3 आधुनिक काल ।

प्राचीन कला

मौर्य कालीन कला-लगभग 322 से 185 ईसापूर्व में कला का उल्लेखनीय विकास हुआ जिसमें राजकीय और लोककला दोनों का विकास हुआ। इसी काल में साम्राज्य की महिमा और गौरव के प्रदर्शन के लिए भव्य स्मारकों का भी निर्माण हुआ राजा अशोक के समय धम्म प्रचार के उद्देश्य से अनेकानेक स्तंभ का निर्माण हुआ। इस काल के स्तंभ, स्तूप के साथ प्रस्तर,मृण मूर्ति, सिक्के आदि प्रचुर मात्रा में मिलते है। पटना के दक्षिणी भाग में कुम्हरार से एक विशाल कक्ष के अवशेष मिले है जिसमें अस्सी स्तंभ थे इसमें एक चमकीला पाॅलिस है जो इसकी सुंदरता को बढ़ाता है।मौर्यकाल के ही चमकीली पाॅलिस वाले पात्र बड़ी संख्या में प्राप्त हुए। 

पाल कालीन कला- पालकाल में भी पत्थर और कांसे के मूर्तियां के निर्माण की एक उन्नत शैली का विकास बिहार में ही हुआ। कांस्य प्रतिमा के निर्माण की इस शैली के निर्णायक ‘ देन धीमन और उनके पुत्र विठपाल का रही है ये नालंदा के निवासी थे। 9वीं शताब्दी के दो महान पाल शासको धर्मपाल और देवपाल के ये समकालीन थे।पालकालीन कांस्य प्रतिभाएं सांचे से ढली हुए है इनके अनेक नमूने नालंदा और गया के पास प्राप्त हुए। 

गुप्त कालीन कला- इस काल का उत्कर्ष 300 से 480 ई के बीच हुए। स्थापत्य कला मूर्ति स्मारक इसी काल के भौतिक संस्कृति के उत्तम उदाहरण है।नालंदा महाविहार के स्तूप संख्या 13 और शिला मंदिर संख्या 3 भी गुप्त कालीन ही है।गुप्त कालीन निर्माण शैली को नागर शैली भी कहा जाता है।पटना के कुम्हरार में दो विहारो के अवशेष प्राप्त हुए जिसमें आरोग्य विहार और आनंद विहार।ये सभी कला बिहार को समृद्ध किया है।

मध्य कालीन कला

पटना कलम-औरंजेब की मृत्यु के बाद इस कला का वास्तविक विकास हुआ। पटना में इन चित्रकार का आगमन पलासी की लड़ाई तथा बंगाल में हुए राजनैतिक परिवर्तन के बाद हुआ। इस शैली का काल लगभग 1760 से बीसवीं शताब्दी के पूर्वार्द्ध तक रहा।पटना कलम लघुचित्र की श्रेणी में आते है जिन्हे कागज तथा कहीं-कहीं हाथी के दांत पर बनाए गए। सामान्यतः इन चित्रों में दैनिक जीवन के दृश्य, जन साधारण के जीवन शैली,मछली बेचती औरत,पालकी उठाए कहार,खेत जोतता किसान,सुनार आदि के चित्र इस शैली में बनाए गए । इस शैली के चित्रकारों में पहला नाम सेवक राम का है काल 1770-1830 का ,हुलास लाल है काल 1785-1885 का। अन्य चित्रकारों में जय राम दास,शिवदयाल लाल आदि प्रमुख रहे। इस श्रृंखला के अंतिम प्रतिनिधि ईश्वरी प्रसाद को बताया जाता है।

आधुनिक कला-

मिथिला कला ये एक लोक कला है मिथिला शैली एक प्राचीन शैली है।इसकी उत्पत्ति कब कहां किसी को नहीं पता है।पंचमार्क जो (कार्षापण) मुद्रा सबसे प्राचीन मुद्रा रही उसपर अंकित प्रतिक तथा मृण्मूतिॅ इस कला से बहुत समानांतर है। मिथिला कला को हर सम्प्रदाय की महिलाओ ने इसका सृजन किया अपितु ब्राह्मण और कायस्थ महिलाओ ने विशेष पहचान दिए। जनश्रुति से राजा जनक के राजप्रासाद की महिलाओ ने इसकी शुरुआत की।उस समय इन महिलाओ का बाहर की दुनिया से कोई सरोकार नहीं था।ये महिलाए अपनी भावनाओ को भित्तिचित्र तथा सतह पर चित्रित करने लगी।ये कलाकृति समाजिक और धार्मिक अवसर पर कार्य करने लगी।मैथिल आकदमी से प्रकाशित पुस्तक “मिथिला कला ओ शिल्प कला” जिसमें प्रथम महिला चित्रकार “चित्रलेखा” का नाम आया है।जिनकी तुलिका ने हजारो चित्रलेखा को जन्म दिया।जगदम्बा देवी,सीता देवी,महासुन्दरी देवी,गोदावरी दत्त शांतिदेवी बौआ देवी प्रमुख है।विधापति की पुस्तक “पुरुष परिक्षा”में दो विशेष कलाकार का शशि और मूलदेव का नाम आया है।अरिपन और भित्तिचित्र ही बाद में पेपर तथा कपड़े पर बाजार में आने लगे।ये कला देश दुनियाभर में प्रमुख स्थान रखती है। कला के क्षेत्र की बिहार की बहुत बड़ी पहचान है।

मंजुषा कला- इसका आरंभ चंपा से जोड़ा जाता है।वर्तमान में इसका प्रचलन भागलपुर और आस-पास के क्षेत्रों से है।ये चित्र कागज, पटसन,और बांस के बने बक्सों पर बनाए जाते है यै बक्से अष्टकोण आकार में होते है इन्हे मंदिर का प्रारुप माना जाता है।इसमें बिहुला-बिसहरी की मिथक कथा को चित्रित किया जाता है।निर्मला देवी,चक्रवर्ती देवी,मनोज पंडित उत्कृष्ट कलाकार है।

टिकुली कला- बिहार विशेष कर पटना की लगभग 800-1000वर्ष पुरानी पारंपरिक हाथ से की जाने वाली चित्र शैली है।ये मुगल काल में फली फूली।पिघले हुए कांच और सोने की परत से बनाए जाते थे।बाद में इसे इनेमल पेंट के साथ हार्डबोर्ड पर बनाया जाने लगा।अशोक विश्वास को इस कला के लिए पद्मश्री भी मिला।

सिक्की कला -ये एक तरह का घास को सुखा कर रंग का प्रयोग कर किसी अच्छे आकार में बनाए जाते है। इसप्रकार बिहार का कला के क्षेत्र में बहुत योगदान है।

संस्कृति-

संस्कृति एक जीवन जीने की उत्तम स्थिति की विधि है।हमारे जीने और सोचने की विधि में अन्तःस्थ प्रवृत्ति की अभिव्यक्ति भी कहा जा सकता है। ये संस्कृति हमारे संस्कार में स्पष्ट देखने को मिलता है।कला,संगीत, साहित्य, धर्म में ये स्पष्ट रुप से देखने को मिलता है।ऐसी प्रत्येक जीवन पद्धति, रीति-रिवाज, आचार-विचार, रहन-सहन, से मनुष्य नवीनता से उच्चता को प्राप्त करता है वो ही संस्कृति का एक उदाहरण होता है।ये संस्कृति ही हमें एक दूसरे के निकट लाते है हमें अपनी संस्कृति को बनाए रखने के साथ -साथ दूसरे की संस्कृति का सम्मान भी करना चाहिए। 

इस प्रकार हम देखते है हमारे बिहार में कला और संस्कृति में बड़ा योगदान है।

— सुजाता मिश्रा

सुजाता मिश्रा

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