इतना टूटा हूं कि
इतना टूटा हूं कि
शब्द भी साथ छोड़ देते हैं
खामोशी बोलने लगती है
रास्ते धुंधले से हैं
कदम पहचान खो बैठे हैं
पर चलना अभी बाकी है
दिल के शीशे में
दरारें गिन नहीं पाता
फिर भी धड़कन चलती है
हर उम्मीद की परछाई
धीरे-धीरे मिट रही है
पर रोशनी बुझी नहीं
आँसू भी अब थक गए हैं
गिरकर जमीन से कहते
अब और मत गिराओ हमें
भीड़ में भी अकेलापन
छाया सा साथ चलता है
कोई आवाज नहीं सुनता
टूटी हुई नींदों में
एक अधूरी कहानी है
जो पूरी होना चाहती है
इतना टूटकर भी मैं
अपने भीतर जिंदा हूं
यही सबसे बड़ी बात है
— डॉ. अशोक
