मुक्तक
जिस्म की चोट से तो आंख सजल होती है
रूह जब गम से कराहे तो ग़ज़ल होती है
बहुत उम्दा हो गजल आंख से आंसू बहते
दर्द की दुनिया में सपनों की पहल होती है
इक शेर बेहतर उनका था दीवान से बढ़कर
हमने पढ़ी पूरी ग़ज़ल उन्वान को पढ़कर
कथा किस्सा कहानी हो सभी को बांच लेती है
सियासत वो तवायफ है कहीं भी नाच लेती है
किसी को शक नहीं होता गज़ब तालीम पाई है
न उत्तर जिन सवालों के उन्हें भी जांच लेती है
है पैसे में गजब गर्मी जहां हो आँच देता है
पराया है या है अपना पलों में जांच लेता है
भरी है जेब या खाली अजब है उसका पैमाना
बिना खोले लिखा क्या है लिफाफा बांच लेता है
— डॉक्टर इंजीनियर मनोज श्रीवास्तव
