हे नाथ सृष्टि में लाकर
हे नाथ सृष्टि में लाकर,
तूने था क्यों भरमाया;
संग रहके मेरे पल-पल,
क्यों ना था गले लगाया!
ना दूर रही थी मंज़िल,
तू ही रहा था संबल;
सर मेरा झुक ना पाया,
था तेरे चरण तल!
उत्ताल उदधि तैराया,
मन में कितना बौराया;
तन को कितना तड़पाया,
ना अपना रूप दिखाया!
भटकाया जगत दिखाया,
भौंरे की भाँति घुमाया;
पर मर्म समझ ना आया,
अपने उर नहीं लगाया!
हारा थका था धाया,
हिय तुमको कहाँ पाया;
‘मधु’ बारम्बार बताया,
तब तत्व समझ आया!
— डॉ. गोपाल बघेल ‘मधु’
