कविता

शेष पृष्ठा

उस दिन घडी थी पापा के हाथ में
और वक्त था मेरे साथ
पता नहीं कहाँ…. कैसे गुम गए
वो घड़ी… और…वो वक्त
कहीं में ठग तो नहीं गई ?
किचड से भरा मुहूर्त
थोप गया है
पलकों के पीछे
देखो तो !
हरप्पा की उस नर्तकी को
आज़ भी खडी है वो
वैसे ही……

आरंभ और अंतिम पृष्ठा
भरकर भेजा है उसने
बाकि पृष्ठा…….
उस पतली डोर को लांघकर
सचमुच कोई भर सकता है क्या
उस बाकि पृष्ठा को ?
पूजाघर में जलता हुआ दिया भी
देखने लगा है पूरब की ओर

अब ना दिन ..ना रात…
मेरी आत्मा को खींच रहा है कोई
मेरी साँस को मेरे देह से
धूप जैसा कुछ आ रहा है
बंद झरोखे की ओट से
उस थोड़े से उजाले में
ले जा रही हूं मैं
कुछ न कर पाने की
मेरी अयोग्यता को
कितने शब्दों के साथ

मुझे जाना है
जाना तो पडेगा
‘हाँ’ या ‘ना’
कौन पूछ रहा है ?
खत्म हो रही है अवधि
धीरे-धीरे ,ये देखो,
अलार्म भी बजने लगा है।

— पारमिता षड़ंगी

पारमिता षड़ंगी

ओड़िआ साहित्य जगत म एक सुपरिचित नाम । वह अपनी आँचलिकता में सशक्त स्त्री-कथाकार एवं कवयित्री ही नहीं, कुशल ओड़िआ भाषानुवादक भी हैं। नारी मनस्तत्व की विश्लेषण, सूक्ष्म अवबोध की अन्वेषण तथा एक बलिष्ठ कहानी के आधार उनकी कहानियों को अलग परिचय देते हैं। जीवनवादी कहानीकार होते हुए भी पारमिता की कविताएँ चेतना और मानसिकता को खूब प्रभावित करती हैं। हिन्दी और ओड़िआ भाषा में कहानी, कविता लेखन में उन्हें कई पुरस्कारों से सम्मानित किया जा चुका है। अब तक उनकी 7 कहानी-संग्रह 5 कविता-संग्रह और 11 अनुवाद-संग्रह प्रकाशित हो चुके हैं। पारमिता की रचनाएँ वागर्थ, आजकल, समकालीन भारतीय साहित्य, भाषा ,नूतन कहानियाँ, देशज, देशधारा, विश्वगाथा, कृति बहुमत, माटी ,कथाक्रम, कथारंग, अंतरंग, पाठ, युगवार्त , परिंदा, व्यंजना आदि अनेक सुप्रसिद्ध पत्रिका में प्रकाशित हुई होने के साथ साथ भारत के विभिन्न क्षेत्रों और विदेश में भी प्रकाशित हुई हैं। उनकी रचनाओं का बंगाली, राजस्थानी, मैथिली ,पंजाबी, गुजराती, मराठी, तमिल, ओड़िआ और इंग्लिश भाषा में अनुवाद किया गया है। पारमिता को उनके कहानी-संग्रह 'संबित के पास जब मैं नहीं थी' के लिए महाराष्ट्र राज्य हिंदी साहित्य अकादमी की तरफ से पुरस्कार से सम्मानित किया गया है। मुम्बई मो -9867113113

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