आदमी का दुःख
नारी की पीड़ा सबको दिखे
पुरुष की न देखे कोय
क्या क्या न वो सहता
रखने को घर की लाज
न कह सके किसी से वो
मन की अपनी व्यथा
भीतर भीतर ही घुटे
बाहर के बड़े बड़े झंझवात वो झेले ले
घर के क्लेश न सह पाए
एक दिन होकर निराश जिंदगी से
कर लेता अपने लीला समाप्त
