कविता

परवरिश और मक्के की रोटी

धीरे धीरे बनती है मक्के की रोटी
गर्म पानी से, गूंथ आटा नरम
हाथ में लोई को गोल गोल घुमा
मां! दुलराती, बनाती मक्के की रोटी
दरकते किनारों को चिकना बनाती
हल्की हल्की थाप देकर
कुशल कारीगर सी दक्षता दिखाती
मां! के हाथ से संवरती मक्के की रोटी
टूट ना जाय ग्लूटेन की कमी से
नहीं है लोच, फिर भी देती मिठास
धैर्य की धीमी आंच पर सेंक
मां! धीरे से पलट देती मक्के की रोटी
नहीं सह पाती तेज ताप
लेकिन फिर धकेल दी जाती
सीधे चूल्हे के आगे, अंगारों पर
भर जाती सौंधी महक से,मक्के की रोटी
भर देती उसमें सुखद स्पर्श सा
देसी घी/ मक्खन का नरम लौंदा
गुड़ की डली, साग संग, फिर थाली में इठलाती
मां! के हाथ की सिंकी गरम मक्के की रोटी
ऐसी ही है परवरिश बच्चों की
जिसमें चाहिए डांट की ताप संग
घी के नरम लेप सा प्यार,नहीं खरी खोटी
मां! के हाथ सिंकी संवरी, गरम मक्के की रोटी

— मनु वाशिष्ठ

मनु वाशिष्ठ

c/o श्री अशोक वाशिष्ठ मंगल भवन ब्लॉक ए फ्लैट नंबर 201 बी बाल मंदिर स्कूल के पास माला रोड कोटा जंक्शन राजस्थान

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