ग़ज़ल
परछाई जब पड़ती है शैतानों की
लगती है हर बात बुरी इंसानों की
दौर बुरा जब आता है इंसां का तो
बातें सुनने लगता है बेग़ानो की
अय्यारों पर जान छिड़कती है दुनिया
कद्र किसे है हम जैसे दीवानों की
सब शम’आ की रोशन देह निहारेंगे
कौन शहादत देखेगा परवानों की
जिनके घर में फाके है उनसे पूछो
क्या कीमत होती मुठ़ी भर दानों की
जिन नाकाराओं को काम नही करना
कौन कमी है उनके पास बहानों की
ग़ैरों के तानों का शिकवा छोड़ दिया
जबसे तान सुनी अपनों के तानों की
— सतीश बंसल
