अंबुबाची मेला, स्त्री और समाज
वर्तमान में अंबुबाची मेला 2026 असम के गुवाहाटी शहर में पूरे उत्साह एवं श्रद्धा भक्ति के साथ मनाया जा रहा है। यहां मां कामाख्या जागृत शक्ति के रूप में विराजमान हैं।
4 दिवसीय यह उत्सव स्त्रीत्व को दिव्यता से जोड़ता है। भारतीय समाज में मासिक धर्म को लेकर बहुत मान्यताएं हैं जिस मासिक धर्म प्रक्रिया को अछूत और अशुद्ध माना जाता है जो सृष्टि के अस्तित्व का आधार है तथा जिससे स्त्री का स्त्रीत्व है वहां रक्त श्रृंगार का यह धार्मिक उत्सव अद्वितीय उदाहरण प्रस्तुत करता है।
हर स्त्री चाहती है वह अपनी कहानी खुद लिखे और जिसमें नायिका वह खुद बने, चाहे प्रेम का श्रृंगार हो या साहस का विचार हो, जो संकीर्णताओं से वो निकली है वापस उसकी एक झलक ही उसको विद्रोही बना देती है, जितना प्रेम, करुणा, ममता, परवाह उसके मन में है उतनी ही दृढ़ता व कठोरता भी है। जिन अधिकारो के लिए उसने जीवन पर्यंत संघर्ष किया हो वह उनको नहीं छोड़ सकती और न ही सामाजिक कुरीतियों की बेड़ियाँ उसको बाँध सकती हैं। जिसको स्वयं मां दुर्गा का स्वरूप माना जाता है वह चाहे बेटी, मित्र, पत्नी, और मां के ही रूप में क्यों न हो वह शक्ति की परिचालक है। अन्याय चाहे खुद के साथ हो या किसी और के, उसके बर्दाश्त के परे है। ऐसे कई जीवंत उदाहरण मौजूद है जहां स्त्री ने अपने सम्मान की रक्षा के लिए स्वयं अस्त्र भी उठाए हैं, महाभारत हो या रामायण स्त्री को हमेशा अबला समझा गया, जिस समाज में कोमल होने का अर्थ कमजोर समझा जाता है वहां पितृसत्ता सर्वोपरि होने के कारण महिलाओं का दमन होना साधारण बात है। पितृसत्ता स्थापित करने में पुरुषों के साथ साथ उन स्त्रियों का भी योगदान है जिनकी रूढ़िवादी और शिथिल विचारधारा ने उन सभी स्त्रियों को अन्याय सहने के लिए मजबूर कर दिया जो सिर्फ अपना नाम कमाना चाहती थी। जो विरोध करने जंग में उतरीं और नहीं रुकी वो आज अपना नाम कमा चुकी है। अगर श्रीजी राधारानी संसार को प्रेम, मां सीता मर्यादा, मां सरस्वती ज्ञान का पाठ सिखा सकती हैं तो मां दुर्गा विषम परिस्थितियों में उग्रता व आक्रामकता के साथ लड़ना भी सिखाती हैं यदि मां पार्वती लाल श्रृंगार से सुशोभित अखंड सौभाग्य का वरदान दे रहीं है तो काली बनकर रक्तबीज जैसे दुष्टों का रक्तपान भी कर रही हैं। जब तक स्त्री अपना अधिकार छोड़े है तब तक वह सही है और जैसे ही वह अधिकार की बात करेगी वहाँ समाज उसको कई नाम देने आ जाएगा।
समाज हमेशा से ही उस युद्धभूमि की तरह रहा है जहां आपको साथ रहना भी है और उसकी संकीर्ण सोच से लड़ना भी है। ऐसे समाज की प्रगति की उपेक्षा कैसे की जा सकती है जहां लोग औरों को गिराकर ऊपर उठना चाहते है न कि सबको साथ लेकर, जो किसी अधर्म से कम नहीं है। जहां सिर्फ स्वार्थ, दंभ, मिथ्या, लोभ जैसे पहिये रथ को चला रहे हैं आखिर वह रथ कितना ही दूर जा पाएगा। ये कहने के लिए रथ के पहिए मात्र हैं पर असल में अंदर दीमक लगी लकड़ी जैसे खोखले हैं। उस बाहरी शक्ति प्रदर्शन का क्या महत्त्व है जिसका स्रोत मलिन आंतरिक भावना है।
जिस समाज में नारी सम्मान एवं उसकी गरिमा को स्वीकार नहीं किया जाएगा उस समाज का पतन होना निश्चित है। अंबुबाची मेला उत्सव का आयोजन हमें यही संदेश देता है कि स्त्री का सम्मान, प्रकृति का आदर एवं सामाजिक कुरीतियों पर विजय प्राप्ति ही जीवन को निरंतर गति देने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाती है। प्राचीन ग्रंथों में भी कहा गया है –
“यत्र नार्यस्तु पूज्यन्ते रमन्ते तत्र देवताः।
यत्रैतास्तु न पूज्यन्ते सर्वास्तत्राफलाः क्रियाः”।।
— सौम्या अग्रवाल
