कहानी – आखिरी टिकट
स्टेशन उस शाम असामान्य रूप से भरा हुआ था। बरसात अभी-अभी थमी थी और प्लेटफ़ॉर्म की भीगी ज़मीन पर भागते कदमों की आवाज़ें किसी बेचैन धड़कन-सी सुनाई दे रही थीं। अनाउंसमेंट बार-बार एक ही बात दोहरा रहा था। “गाड़ी संख्या 12155, भोपाल एक्सप्रेस, कुछ ही मिनटों में प्लेटफ़ॉर्म नंबर तीन से प्रस्थान करेगी…”
टिकट खिड़की के सामने लंबी कतार लगी थी। उसी कतार के आख़िरी छोर पर खड़ी थी ,नैना। उसकी उँगलियाँ भीग चुकी थीं, पर हथेली में दबा वह पुराना-सा पत्र अब भी सुरक्षित था। पत्र के कोने घिस गए थे, शब्द हल्के पड़ गए थे, पर एक पंक्ति आज भी उतनी ही साफ़ थी “अगर कभी लौटना चाहो, तो मैं उसी शहर, उसी स्टेशन पर तुम्हारा इंतज़ार करूँगा।” — तुम्हारा आरव
नैना ने काँपते हाथों से पत्र मोड़ा। पंद्रह साल पहले वह इसी शहर से गई थी, बिना मुड़कर देखे, बिना कुछ कहे, बिना किसी सफ़ाई के। उसने प्रेम को ठुकराया नहीं था; बस घरवालों की इच्छा, पिता की बीमारी, और छोटे भाई-बहनों की ज़िम्मेदारियों के आगे अपने मन को चुप करा दिया था। फिर जीवन की दौड़ में इतनी उलझी कि पीछे छूटे एक चेहरे को बस यादों में रख सकी।
लेकिन तीन दिन पहले अचानक पुराने सामान के बीच उसे यह पत्र मिला। उसी के साथ एक और कागज़ एक अस्पताल की पर्ची, जिस पर किसी परिचित लिखावट में दर्ज था।
“आरव मेहरा — हृदय रोग विभाग।” बस तब से उसके भीतर एक ही बेचैनी थी,उसे जाना है। एक बार। केवल एक बार। कहने के लिए नहीं कि वह आज भी उससे प्रेम करती है; बल्कि यह पूछने के लिए कि क्या इतने वर्षों बाद भी किसी के इंतज़ार की उम्र बची रह जाती है?
कतार धीरे-धीरे आगे बढ़ी। नैना जब खिड़की तक पहुँची, तो क्लर्क ने स्क्रीन पर नज़र डालते हुए कहा “भोपाल? … सिर्फ़ एक टिकट बची है। आख़िरी टिकट।”
नैना का दिल जैसे उछलकर गले में आ अटका। “मुझे वही चाहिए,” उसने तुरंत कहा।
क्लर्क ने टिकट निकालकर उसकी ओर बढ़ा दी। “जल्दी कीजिए, ट्रेन खुलने वाली है।”
नैना ने टिकट पकड़ ली। वह कागज़ का छोटा-सा टुकड़ा उसके लिए किसी अवसर, किसी प्रायश्चित, किसी अधूरे वाक्य का अंतिम शब्द बन गया था। वह भागती हुई प्लेटफ़ॉर्म की ओर बढ़ी। ट्रेन सीटी दे चुकी थी। किसी तरह डिब्बे में चढ़कर उसने राहत की साँस ली।
सीट पर बैठते ही उसने खिड़की से बाहर देखा। बारिश की बूँदें शीशे पर बह रही थीं और बाहर का शहर पीछे छूटता जा रहा था वैसे ही जैसे वर्षों पहले छूटा था। फर्क बस इतना था कि तब वह भाग रही थी, और आज लौट रही थी। रात लंबी थी। डिब्बे की पीली रोशनी में उसने फिर पत्र खोला। हर शब्द जैसे कोई पुराना घाव सहला रहा था— “नैना, प्रेम का अर्थ साथ पाना ही नहीं होता। कभी-कभी किसी के निर्णय का सम्मान करते हुए उसी मोड़ पर खड़े रहना भी प्रेम होता है…” नैना की आँखें भर आईं। क्या सचमुच कोई पंद्रह साल तक उसी मोड़ पर खड़ा रह सकता है?
सुबह जब ट्रेन भोपाल पहुँची, तो उसके कदमों में अजीब-सी घबराहट थी। स्टेशन से बाहर निकलते ही उसने सीधा उसी अस्पताल का रुख किया, जिसका नाम पर्ची पर लिखा था। अस्पताल के हृदय रोग विभाग में पहुंच कर नैना ने रिसेप्शन पर जाकर धीमे स्वर में पूछा “मुझे आरव मेहरा से मिलना है।” रिसेप्शन पर बैठी नर्स ने कुछ क्षण उसे देखा, फिर रजिस्टर पलटते हुए पूछा, “आप कौन?”
नैना के पास इस प्रश्न का कोई सरल उत्तर नहीं था। वह कुछ पल चुप रही, फिर बोली “पुरानी पहचान हूँ… बहुत पुरानी।” नर्स ने गहरी साँस ली। “आप देर से आई हैं।”
नैना के पैरों तले ज़मीन खिसक गई। “मतलब…?” “कल रात उनकी मृत्यु हो गई।”
शब्द बहुत साधारण थे, पर नैना के भीतर जैसे सब कुछ टूटकर बिखर गया। उसने सामने की कुर्सी पकड़ ली। होंठ काँपे, पर आवाज़ न निकली। इतने वर्षों की दूरी, इतने बरसों का मौन, इतनी सारी अनकही बातें सब एक ही वाक्य के नीचे दब गईं “आप देर से आई हैं।”
उसकी आँखों से आँसू ढुलक पड़े। वह किसी तरह खुद को सँभालकर मुड़ी ही थी कि नर्स ने उसे पुकारा “सुनिए…” नैना ठिठक गई। नर्स ने दराज़ से एक छोटा-सा लिफ़ाफ़ा निकाला। “उन्होंने कहा था अगर कभी ‘नैना’ नाम की कोई स्त्री आए, तो यह उसे दे देना।”
नैना के हाथ काँप उठे। उसने लिफ़ाफ़ा खोला। भीतर एक पुरानी रेल टिकट थी पीली पड़ चुकी, किनारों से मुड़ी हुई। उसके पीछे आरव की लिखावट थी “उस दिन तुम चली गई थीं। मैं इसी स्टेशन तक तुम्हें छोड़ने आया था। मैंने सोचा था, तुम्हें रोकूँगा… पर तुम्हारी आँखों में मजबूरी देख ली। तुम्हारी ट्रेन छूटने के बाद मैंने वापसी के लिए टिकट लिया था । आखिरी टिकट। तब समझा कि कुछ यात्राएँ साथ होकर भी अकेले पूरी करनी पड़ती हैं।
मैंने विवाह नहीं किया। इंतज़ार भी नहीं कहा उसे… बस मन ने तुम्हारे हिस्से की जगह किसी और को दी ही नहीं। यदि तुम कभी लौटो, तो अपने आपको दोष मत देना।
प्रेम में देर हो सकती है, अभाव हो सकता है, विरह हो सकता है । पर शिकायत नहीं होनी चाहिए। और हाँ, यदि यह पत्र तुम्हारे हाथों तक पहुँचे, तो समझना
मैंने तुम्हें अंतिम बार नहीं, आखिरी साँस तक चाहा।”
नैना के आँसू उस टिकट पर गिरते रहे। वह टिकट अब सिर्फ़ एक यात्रा का प्रमाण नहीं था; वह उन दो जीवनों का दस्तावेज़ था जो साथ चल सकते थे, पर समय की पटरियाँ उन्हें अलग दिशाओं में ले गईं। नर्स ने धीरे से कहा “उनके तकिए के नीचे यह टिकट हमेशा रहती थी। आखिरी दिनों में भी अक्सर कहते थे ‘कुछ लोग लौटते नहीं, फिर भी उनके लिए दरवाज़ा खुला रखना चाहिए।’”
नैना ने टिकट को सीने से लगा लिया। वह अस्पताल की खिड़की के पास जाकर खड़ी हो गई। बाहर वही सुबह थी, वही भीगा शहर, वही भागती दुनिया पर उसके भीतर सब कुछ स्थिर हो चुका था। उसने पहली बार जाना हर स्टेशन पर छूट जाने वाली चीज़ ट्रेन नहीं होती; कभी-कभी एक पूरा जीवन छूट जाता है।
और उस दिन उसे यह भी समझ आया कि दुनिया में सबसे भारी कागज़ कोई वसीयत, कोई डिग्री, कोई दस्तावेज़ नहीं होता । सबसे भारी होता है वह “आखिरी टिकट”,
जो हमें वहाँ तो पहुँचा देती है जहाँ हमें जाना था, पर वहाँ नहीं पहुँचा पाती जहाँ हमें समय रहते होना चाहिए था।
— डॉ. सारिका ठाकुर “जागृति”
