ग़ज़ल
मुफ़्त मिलती नहीं इज़्ज़त कमानी पड़ती है
जगह ज़माने में अपनी बनानी पड़ती है
पूरे करने हों जो ख़्वाब तुमने देखे थे
नींद रातों की अक्सर गंवानी पड़ती है
सच से मुतमइन नहीं वो होता उसको तो
कहानी रोज़ इक नई सुनानी पड़ती है
रंग रूप तो देता है खुदा बच्चों को
मगर तहज़ीब तो उनको सिखानी पड़ती है
मैंने ये सोच के तुमको सुनाई हैं ग़ज़लें
बिके न माल तो कीमत घटानी पड़ती है
— भरत मल्होत्रा
