कविता

आइसक्रीम जिंदाबाद

ठंडी-मीठी, रंग-बिरंगी, है आइसक्रीम रानी,
देख – देख बच्चों के मुँह में, आ जाता है पानी।

गर्मी भगाए, मन बहलाए, रूप और रंग लुभाए।
नन्हीं सहेली – सी लगती है, अपने पास बुलाए।

चॉकलेट, वनीला, स्ट्रॉबेरी, मैंगो का है जादू,
खाते ही मुँह में घुल जाए, स्वाद करे बेकाबू।

दूध-मलाई, चीनी-केसर, मेवों की यह माला है।
हड्डी को मजबूत बनाए, कैल्शियम का प्याला है।

पीली, लाल , हरी, नीली, , देखो कितने प्यारे रंग,
देख के बच्चे दौड़ें-झूमें, जाग उठे खुशियों की उमंग!

एक चाटो, दो चाटो फिर भी, मन कितना ललचाए,
जीभ कहे — ” एक और तो दो भाई” , फ्लेवर अति मन भाए।

स्टिक लो या गोल – सी कप में ,चाहे कोन में लाओ।
आइसक्रीम जान है अपनी, खाओ और मुस्काओ।

कभी-कभी ब्रिक में भी पापा, घर में लेकर आते।
सभी लोग टुकड़ों में खाकर, मिल आनंद उठाते।

आइसक्रीम मुझे लगती है, गर्मी का सुंदर उपहार।
जाड़े में भी खा लेता हूँ, जब माँ सँग जाऊँ बाजार।

ठंडक देती, खुशी लुटाती, यह है सबकी प्यारी,
आइसक्रीम जिंदाबाद बोलिए, फेवरेट दोस्त हमारी।

— गौरीशंकर वैश्य विनम्र

*गौरीशंकर वैश्य विनम्र

117 आदिलनगर, विकासनगर लखनऊ 226022 दूरभाष 09956087585

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