कविता

जाति के नाम पर

मेरा देश ऐसा है भैया,
जहाँ ज़मीर से पहले जाति जागता है,
इसके धुन में बड़ा से बड़ा अपराधी
अपने अपराधों संग खुलकर नाचता है।

कह नहीं सकते, इक्कीसवीं सदी में
आए भी हैं या नहीं,
अमूमन हर कोने में वही मंजर है—
बदलता कुछ भी नहीं कहीं।

हत्या, डकैती, बलात्कार के दोषी
अब भी बेखौफ घूम रहे,
संविधान के इस राज में भी
अपराध आखिर क्यों कम नहीं हो रहे?

जिम्मेदार किस महल में सोए हैं,
किसे खबर है, कौन बताए?
कानून का राज कहने भर को है,
जनता भीतर ही भीतर घबराए।

अपराध की घटनाओं पर
कैसे काबू तुम पाओगे?
या नियम-कानून भी अब
जातिवाद से ही चलाओगे?

पीड़ित यदि अपने घर का हो
तो खुद को सबसे बड़ा शोषित बतलाओगे,
मगर दमित-शोषित वर्ग का हो तो
तत्काल एनकाउंटर कर जाओगे।

अरे अपराधी को कब तक
जाति के नाम पर बचाते रहोगे?
हज़ारों वर्षों की मलाई खाकर भी
क्या अब भी जाति के नाम पर खाते रहोगे?

— राजेन्द्र लाहिरी

राजेन्द्र लाहिरी

पामगढ़, जिला जांजगीर चाम्पा, छ. ग.495554

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