कविता

हां मैं सच हूं

हां मैं सच हूं
एक दिन सामने ज़रुर आऊंगा
उठ जाएगा फिर झूठ से पर्दा
दोषियों को सजा जरूर दिलवाऊंगा।

पहले भी कई बार मैं ऐसी
अग्नि परीक्षाओं से गुजर चुका हूं
झेले तमाम दोषारोपणों के दंश
हुआ ज्यादा प्रखर एवं निखर चुका हूं

ज़रूरत है कि बस आप
अपना विश्वास क़ायम रखिये
देते रहिये आप सदैव सत्य का साथ
झूठ को टाटा और बाय-बाय कहिये।

हां यह सच है कि इस बार की चोट
है कुछ ज्यादा तीव्र और गहरी
अपनों ने ही कठघरे में खड़ा किया
जिनको बनाया था हम सबने प्रहरी।

इन चढ़ावा चोरों ने बेशर्मी से
हमारा मस्तक शर्म से झुका दिया
करोड़ों रामभक्तों को लगी ठेंस भारी
हमारे विश्वास का यह सिला दिया ।

अभी यह सनातन के
इम्तिहान की घड़ी है
आस्था पर भारी विपदा
आन पड़ी है।

ऐसे में आवश्यक है कि थोड़ा
धैर्य धारण किया जाए
जांच में लाई जानी चाहिए तेजी
दोषी को कठघरे में खड़ा किया जाए।

समय आने पर शेष सबका भी
नाम सामने अवश्य आएगा
और आस्था पर लगा यह कलंक
सदा-सदा के लिए मिट पाएगा।

इसके लिए जरूरी है कि पारदर्शी
तरीके से जांच की जाए
कठोर धाराओं में दर्ज हों मुकदमें
सबूतों से छेड़छाड़ न की जाए।

विश्वास की नींव जिन्होंने भी
बेरहमी से हिलाकर रख दी
उनके साथ न हो कोई रियायत
न दिखाई जाए थोड़ी भी हमदर्दी ।

जिन्होंने भी यह भारी पाप किया है
करोड़ों जनमानस को संताप दिया है
उनको शीघ्रातिशीघ्र सजा दी जाए
जनता में विश्वास फिर से भरा जाए।

— नवल अग्रवाल

*नवल किशोर अग्रवाल

इलाहाबाद बैंक से अवकाश प्राप्त पलावा, मुम्बई

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