जीवन का उलझा गणित
बायलॉजी के चीर-फाड़ से बचने के लिए, गणित चुन तो लिया पर जब गणित का विकराल रूप त्रिकोणमिति, अलजेब्रा, मेंसुरेशन और “थीटा”से पाला पड़ा तो दिमाग’रोनिघात’ हो गया। एक तरफ कुआ(जीव विज्ञानं) और दूसरी जानिब गहरी खाई(गणित) मैथ्स करे तो क्या करे? हिंदी माध्यम से अंग्रेजी मीडियम में पढ़ने पर आज तक भी थीटा, साइन, कास, सेक नहीं समझ सके? जीवन के मैदान में चाहे जी तोड़ श्रम कर इंजीनियरिग कर ली हो परंतु पिचतालिस वर्ष की सेवा एवं 64 के होने के बाद भी इस मुए सिर ख़प्पू गणित के कैलकुलस, विक्टर, स्टेटिक्स, डायनामिक्स, फेक्टर, लोगेरिथम आज पर्यन्त तक समझ नहीं पाएं कि ये क्या बला है? पर जीवन में कुछ बनने के लिए, ज़्यादा पाने के वास्ते इन अनजाने टॉपिक्स से माथा फोड़ी करते रहे। डायनामिक्स की डायन तथा लागेरिथम की टेबल गले पडगईं। इंट्रीगल कैलकुलस, हाइपरबोला, पेराबोला क्या बोला? इन 64 वर्षों के बाद भी अनसुना है? सरल सा लगनेवाला प्राण खींचूँ गणित जिसने रुला-रुला दिया। सपने में भी रूँह कांप-कांप गई। ढेरों नोट्स बना-बना कर भी प्राणहन्ता “मैथ्स”जरा भी गले नहीं उतरा पर अब तो ये “मैथेमेटिक्स”गले पड़ चुका था। वह गणित जिसके पीछे पूरी दुनिया पागल है। इंजीनियर उगलने वाला मैथेमेटिक्स गले की हड्डी बन चुका था। गणित को अक्खी दुनिया मान रही थी और हम एक्स बराबर5 तथा वाई बराबर10 (सपोज)मानने को विवश थे। मानना गणितज्ञ की मज़बूरी है। मानने पर ही अबुझा गणित पढा जा सकता था। इस जानलेवा गणित के सिवा इस जहाँ में सब बेकार , फीका-फीका, नीरस था। अब इस प्राणघातक गणित से पीछा छूटना असंभव था। सो इसकी ट्यूशन करी पर जब बार-बार प्रश्न करते कि थीटा क्या मुसीबत है? ये समझ से परे होता एक दिन सर ने भी तौबा कर ली पर कुछ बनने के लिए हम सब कुछ खोने को आमादा थे। हमारे ज़माने में 24 दिन दसेरा-दिवाली, 10दिन बड़े दिन और 90 दिन गर्मी की छुट्टी पड़ती पर इधर मगज से गणित का ही कीड़ा कुलबुलाता रहता, सारी छुट्टियां तनाव में ही बीतती, जैसे इश्क में उलझे हुए आशिक की बीतती है। गणित का भूत ऐसा था कि अलजेब्रा पढ़ते तो ट्रिगनामेंट्री की ट्रिन-ट्रिन शुरू हो जाती, मेंसुरेशन के फार्मूले याद करते तो अलजेब्रा”जेब्रा”लगने लगता । भौतिकी में अल्फ़ा, बीटा, गामा किरणे थी पर इस खुनचुसे गणित में ये माने हुए “कांस्टेंट”थे। पाई का मान 22बटे7ही क्यों था? और 3.14 रखना मज़बूरी थी? चौबीसों घंटे भर्तीआई.सी.यू. मरीज़ की तरह अत्यंत गंभीर वाली स्थिति हम गणित के छात्रों की थी। गणित का “ग”समझने में ही कई वर्ष खप गए पर ये केंसर रूपी मैथ्स आज तक अनजाना है। ईश्वर ही जाने उसने क्यों मेरे गुरूजी को मति दी कि उन्होंने मुझे इस मौतनुमा गणित में धकेल दिया? जीवनभर “पाई”से पीछा छूटा नहीं और यौवनावस्था में “बाई”से पाला पड़ गया, जीवन के सारे फलसफे फेल हो गए, इस मारक गणित के सामने। मुझ जैसे “सत्रह पचोल”छात्र”करो या मरो”से रहे इस गणित के सामने। निराशा में कई मर्तबा खुदको “ज़ीरो”बनाने का कृत्य किया इस नाशमिटे विषय ने। लोगो ने हंसी उड़ाई किंतु गणित ने खूब रुलाया? बमुश्किल समझ आने वाला बीजगणित, रफ्ता-रफ्ता दिमाग में घुसनेवाला रेखागणित, तीनो लोकों की मानिंद अनजानी त्रिकोणमिति, मगज़ को उलझानेवाली मेंसुरेशन आज सठियाने की एज में भी ना समझ आएं है। जिंदगी के किसी भी मोड़ पर न इंट्रीगल काम आया न ही कैलकुलस? अलबत्ता ताउम्र माइनस हुआ, प्लस करने लगा तो यकायक भागित हो गया, दुनिया वालों ने मुझमे दुर्गुणों का गुणाकर देखा, सद्गुणों को सदैव ही माइनस जाना, प्लस से श्रम कर बच्चों को योग्य बनाने का प्रयास किया तो वे सात फेरे लेकर “नौ दो ग्यारह”हो गए? फिर वही माइनस का माइनस रहा। जहाँ फायदे का अवसर आया हमेशा जिम्मेदारियों से भागित हुआ और प्लस करने में पूरी उम्र सरप्लस हो गई। हर कोण से नेगेटिव ही पीछे पड़ा रहा, लोग मुझे बड़ा प्लस करने वाला’प्लसर’ मानते रहे? गणित में ग्राफ व् स्टेटिक्स पढ़ा किन्तु यश तथा कीर्ति का ग्राफ सदैव नीचा रहा। पाई-पाई(गणित वाली नहीं)जोड़कर परिजनों के वास्ते मकान जुटाया अब वे कब्ज़ा कर मेरे कर्तव्यों, जिम्मेदारियों का माइनस कर रहे है। जीवन में प्लस, प्लस कर धनराशि जमा कर बच्चों को इसी गणित के गुनताडे में फंसाकर योग्य बनाया वे विदेश जाकर मेरे में कई ऋणात्मक फेक्टर निकाल रहे है। निचोड़ ये है कि अब तक जीवन में प्लस से कम पर माइनस से अधिकतर पाला पड़ रहा है क्योकि हर मोड़ पर मुझे प्लस वाले लोग ही टकरा रहे है। वे खुद प्लस लेकर मुझे माइनस थमा जाते है। गणित पढ़कर मैने चाहे आम जीवन में दाल-रोटी जुगाड़ ली हो परंतु बाकी के कई गणितों में , मै फेल रहा हूँ। असफल होकर भी मै खुद को दोयमदर्जे का मानता रहा हूँ और यही मुगालता मुझे मैथ्स का मल्टी पल फेक्टर लगता है।
लाइफ में अच्छाई का सज्जनता से गुणा किया तो गुणनफल बुराई आया, बुराई को ढंकने के जतन किये तो प्रतिफल उभ्यनिष्ट( नीरस) आदमी के रूप में प्रगट हुआ। धन को त्याग से जोड़ने के प्रयास में ऋण हाथ में आया, ज्यादा भला बना तो परिणीति भागित हो गई फल वही ढाक के तीन पात? निष्कर्ष ये है कि दुनियावालों ने मुझमे माइनस(बुराई)ढूंढकर मुझे “सिफर”बता दिया है। जीवन के हर क्षेत्र में वर्ग करने की कोशिश की तो घनमूल। हो गया । कंजूस बनने की दृष्टि से जब भी “अंडर रुट” करने का सोचा तो घात तीन हो गई याने इसे लेकर भी सारे गणित असफल सिध्द हुए । स्टेटिक्स के ग्राफ जरूर बनाएं पर लाइफ में धन-दौलत का टेबल ऊचा न जाकर समतल ही बना रहा। प्राथमिकता पढ़ी पर उसके क्रम को आज तक तय नहीं कर सका। समीकरण पढ़ी किन्तु जीवन कभी सरल नहीं रहा, टेढ़ी-मेड़ी समीकरणों में ही फंसा पड़ा रहा। चापलूसी के अनुपात में जीवन में खुदको समानुपातिक नहीं बना पाया। सेकेंडरी कक्षाओ में श्रेणियों के सवाल बांचे परंतु खुद्की श्रेणी सामान्य निम्न ही रही, उच्चता पाने में भोंदू ही रहा। परमुटेशन-कॉम्बिनेशन के प्रश्नो में इतना उलझा कि स्वयं के परिवार का कॉम्बिनेशन(तालमेल)भी ठीक से नहीं बन पाया, घर में सबसे बड़ा होकर भी सबसे छोटा-अदना ही सिध्द हुआ। यौवन की दहलीज पर जब सात राउंड लगाएं तो मोहतरमा राजनीति शास्त्र की छात्रा निकली मै”गणितज्ञ” न उनकी राजनीति समझ पाया न वे मेरा गणित? उम्र के तमाम गणित सामान्य दोयम दर्जे में ही “अन साल्वड” रह गए? अंकगणित में औसत के प्रश्न पढ़े पर लाइफ में “औसत-दर्ज़े”का ही रह पाया, खुद का औसत, अव्वल दर्ज़े का न बना पाया। लाभ-हानि के सवाल छुड़ाए परंतु लाभ कम हानि ज़्यादा जीवन के उतार-चढ़ाव में हाथ आई। सरलीकरण टॉपिक पढा, पर जीवन कभी सरल नहीं लगा? ताउम्र कठिनाइयां ही नसीब हुई। कार्य-समय-दुरी के चेप्टर पढे पर कोई भी कार्य समयानुकूल नहीं बन सके, सदैव समय प्रतिकुल ही रहा। रिश्तों की नज़दीकियां हमेशा नौकरी की व्यस्तता से दूरियां ही सिध्द हुई? सज्जनता, सत्यता, सहृदयता, नैतिकता के “फेक्टरों”में भी मै खास उल्लेखनीय उपलब्धि नहीं कबाड़ पाया? जीवन का मूल गणित है कि -हाड़तोडू श्रम धन भाग्य बराबर धनार्जन किन्तु कई इस सूत्र में फेल हो रहे है। दूसरी ओर कम मेहनत करनेवाले +भाग्यशाली लोग पैसेवाले होते है। मतलब साफ है कि लक्ष्मी उल्लू के वाहन पर सवार होकर आती है। उल्लू किस्म के लोग दुनिया में अधिक कारगर साबित होते है। बुध्दिजीवी सदैव फटेहाल रहते है। किसी शायर ने कहा है- “खुदा ने हुशन नादानों को बख्शा, ज़र रजिलों को। अक्लमंदों को रोटी खुश्क और हलवा बखीलों को”। जब इस गणित से सामना हुआ तो सारा “टेलेंट”धरा रह गया, उस प्रतिभा की गलत फहमी दूर हो गई थी। इस विषय ने समूची इंटलीजेन्सी में दीमक लगा दी थी, और दिन में तारे तथा रात में सूरज दिखा दिया था। प्रतिभा किसी की बपौती नहीं है पर इस गणित ने बुध्दिमत्ता की आँखों में भी टप-टप आंसू ला दिए थे। गणित में जिसने दिमाग खर्चा वे पाई का मान निकाल कर जान सकें कि गोलाई वाली वस्तु से जुडी है”पाई”। सात फेरों के बाद लाइफ में आई “बाई”ने भी कई तरह के नए गणित पढ़ा दिए और ये भी देखा कि जिंदगी में जिसे मेथेमेटिक्स रास नहीं आया वे बन गए बम्बई के “भाई”कुछ बचे तो सेलून वाले बने “नाइ”और जिसे ये जंच गया वे “माई”के लाल आरक्षण में लटक गए? चंद राजनीति के गणित में उलझ गए?
कुल मिलाकर गणित ये हैकि इस गणित के चक्कर में अपन को घनचक्कर नहीं बनना है। रफूचक्कर होकर इस जहाँ के गणित को समझना है। प्रेम के गणित में फसना नहीं है। माया-मोह के गणित में प्राणी कई जन्मों से गले-गले डूबा पड़ा है। जीवन के हर मोड़ पर भगवान गणित के गुन्ताडे से बचाये क्योकि कई दफा जिंदगी में हर गणित फेल हो जाते है। जीवन मे दिन, पल, सांस का घटाव होता है। हर रोज़ कड़वे घूंट, अनुभव, कमियां जुड़ती जाती है। हर घड़ी परिस्थितियों का गुणा-भाग चलता रहता है। सदैव पुण्य, सद्कर्मो का वर्गमूल किया जाना तथा दुष्कर्मो, पापों का घनमूल किया जाना चाहिए क्योंकि जीवन का अंतिम सत्य शून्य (ज़ीरो) है।
— दिनेश गंगराड़े
