मानवता के सच्चे रक्षक
1 जुलाई – डॉक्टर्स डे पर विशेष कविता
सफेद कोट में “सेवा” का दीप,
हरेक पीड़ा में रहते हैं समीप।
दिन हो, रात हो या अंधियारा,
डॉक्टर देते जीवन को सहारा।
वो दर्द किसी का देख न पाते,
अपने सुख भी भूल ही जाते।
थकी हुई आँखों में सपने कम,
रोगी की मुस्कान में ही है दम।
यूं आपदा हो या हो महामारी,
वे डटे रहते बन के जिम्मेदारी।
कोरोना के कठिन वक़्त में भी,
सेवा ज्योति जली बारी-बारी।
ज्ञान हैं करुणा और समर्पण,
इनसे सँवरता उनका जीवन।
वे हर धड़कन की रक्षा करते,
नवजीवन का उपहार हैं देते।
आओ मिलके सम्मान बढ़ाएँ,
यहाँ कृतज्ञता के दीप जलाएँ।
डॉक्टर तो मानवता की शान,
उनसे ही सुरक्षित रहते प्राण।
— संजय एम तराणेकर
